14.25

संस्कृत

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारंभपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥

mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāripakṣayoḥ sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate

अनुवाद

जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु दोनों पक्षों के प्रति समान रहता है, और जिसने सभी आरम्भों का पूरी तरह त्याग कर दिया है, वह गुणातीत कहलाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

चित्रण की अंतिम पंक्ति, जो श्लोक 24 की सूची में मान/अपमान और मित्र/शत्रु को जोड़ती है और सभी नए उपक्रमों को आरंभ करने के त्याग पर समाप्त होती है — फिर उस अवस्था का सीधा नाम लेती है: गुणातीत, “गुणों से परे”; श्लोक 21 से चला आ रहा अर्जुन का मूल प्रश्न अंततः नाम लेकर उत्तरित होता है। फिर श्लोक 26 वह करता है जो अध्याय 2 में स्थितप्रज्ञ के चित्रण ने कभी नहीं किया: वह यहाँ तक पहुँचने का वास्तविक साधन बताता है, और वह साधन विशुद्ध बौद्धिक नहीं, बल्कि भक्तिमय निकलता है। सर्व-आरम्भ-परित्यागी — “सभी [स्वार्थपूर्ण] उपक्रमों को त्याग चुका” — फिर से गीता 12.16 ही है। चित्रण अपने विषय का नाम लेकर समाप्त होता है: गुणातीत, “जो धागों से आगे निकल चुका है”, और गीता 14.26 बताता है कि वह वहाँ कैसे पहुँचा।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

mānāpamānayos tulyasमानापमानयोस् तुल्यस्
मान और अपमान में समान (māna-apamānayoḥ + tulyaḥ)
tulyo mitrāripakṣayoḥतुल्यो मित्रारिपक्षयोः
मित्र और शत्रु के पक्ष में समान (tulyaḥ + mitra-ari-pakṣayoḥ)
sarvārambhaparityāgīसर्वारंभपरित्यागी
सभी आरम्भों का त्याग करने वाला (sarva-ārambha-parityāgī)
guṇātītaḥ sa ucyateगुणातीतः स उच्यते
वह गुणातीत कहलाता है (guṇa-atītaḥ + saḥ + ucyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Every item before this one in the portrait is an attitude — staying even toward honor, friendship, censure. The last item switches registers entirely: abandoning all undertakings is a behavior, not a disposition, and it’s aimed precisely at rajas’s defining compulsion from verses 7 and 12 — the itch to keep starting new things. The portrait doesn’t end on one more feeling to hold evenly; it ends on the one compulsive action pattern that finally has to stop.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि परिणामों के प्रति समभाव आ जाना अपने आप में मंज़िल नहीं है — किसी न किसी समय वह असली बाध्यकारी आदत, यानी पिछला काम पूरा करने से पहले ही नए-नए काम शुरू करते रहने की बेचैनी, एक व्यवहार के रूप में रुकनी चाहिए, न कि केवल एक भावना के रूप में धीमी पड़नी चाहिए।

व्यावसायिक

  • ध्यान दें कि जीत और हार के प्रति शांत दृष्टिकोण अपने आप में लगातार नई पहलें शुरू करते रहने की आदत को ठीक नहीं करता — किसी न किसी समय ज़रूरत से ज़्यादा काम शुरू करने का यह व्यवहार सीधे तौर पर रुकना चाहिए, क्योंकि परिणामों के प्रति समभाव और प्रतिबद्धताओं के प्रति अनुशासन दो अलग-अलग उपाय हैं।

परिवार और समाज

  • ध्यान दें कि पारिवारिक कलह पर कम प्रतिक्रिया करना उन दायित्वों को ज़रूरत से ज़्यादा ओढ़ लेने के ढर्रे को सचमुच रोक देने जैसा नहीं है, जिन्हें आप निभा नहीं सकते — आपका दृष्टिकोण सुधर सकता है, जबकि आपकी थकान का कारण बनने वाला व्यवहार तब तक चलता रहता है जब तक आप उससे सीधे नहीं निपटते।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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