संस्कृत
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥
kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho kim ācāraḥ kathaṃ caitāṃs trīn guṇān ativartate
अनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे प्रभो, जो इन तीनों गुणों से परे हो जाता है, वह किन लक्षणों से पहचाना जाता है? उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार कर जाता है?
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन इस अध्याय में पहली बार बोलते हैं, और उनका प्रश्न संरचना में 2.54 के प्रश्न “स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के लक्षण क्या हैं?” के बिल्कुल समान है — यह और अधिक सिद्धांत की माँग नहीं, बल्कि एक ठोस व्यक्ति के वर्णन की माँग है। कृष्ण का उत्तर श्लोक 22-25 तक चलता है, ठीक उसी तरह जैसे 2.55-72 ने स्थितप्रज्ञ के विषय में इसी जैसे प्रश्न का उत्तर दिया था। दोनों चित्र मूलतः एक ही अवस्था का वर्णन अलग-अलग शब्दावली में करते हैं — अध्याय 2 मानसिक संतुलन के माध्यम से, और यह अध्याय तीनों गुणों से अलग खड़े रहने के विशिष्ट दृष्टिकोण से। अर्जुन लिंग, अर्थात् देखे जा सकने वाले लक्षण, माँगते हैं — वही माँग जो गीता 2.54 में स्थितप्रज्ञ के बारे में की गई थी। कृष्ण का उत्तर (गीता 14.22–गीता 14.25) लगभग शब्दशः वही चित्र है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- kair liṅgais trīn guṇān etānकैः लिङ्गैस् त्रीन् गुणान् एतान्
- किन लक्षणों से इन तीनों गुणों से (kaiḥ + liṅgaiḥ + trīn + guṇān + etān)
- atīto bhavati prabhoअतीतो भवति प्रभो
- अतीत हो जाता है, हे प्रभो (atītaḥ + bhavati + prabho)
- kim ācāraḥ kathaṃ caitāṃsकिं आचारः कथं चैतांस्
- उसका आचरण क्या है, और कैसे इन (kim + ācāraḥ + katham + ca + etān)
- trīn guṇān ativartateत्रीन् गुणान् अतिवर्तते
- तीनों गुणों को पार करता है (trīn + guṇān + ativartate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
In twenty verses of guna-analysis, Arjuna doesn’t speak once — until here, at the exact point Krishna has finished describing bondage but before he’s described its opposite. A single question, placed at precisely this hinge, is doing the work of an editor’s note: it tells the reader that everything before this was necessary setup, and everything about to follow is the actual point the setup existed for.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि किसी लंबी व्याख्या के बाद आपके अपने प्रश्न स्वाभाविक रूप से कहाँ उठते हैं — वह बिंदु जहाँ आपको आख़िरकार पूछना ही पड़ता है कि 'तो यह वास्तव में दिखता कैसा है', प्रायः वही असली बिंदु होता है, और उससे पहले का सब कुछ उसी एक प्रश्न की तैयारी था।
व्यावसायिक
- किसी लंबे तकनीकी प्रस्ताव की समीक्षा करते समय उस ठीक बिंदु पर ध्यान दें जहाँ आपको यह पूछने की ज़रूरत महसूस होती है कि 'पर व्यवहार में यह दिखता कैसा है' — यह सहज भाव प्रायः उस मोड़ को चिह्नित करता है जहाँ ज़रूरी पृष्ठभूमि समाप्त होती है और वह वास्तविक निर्णय शुरू होता है जो आपसे माँगा जा रहा है।
परिवार और समाज
- ध्यान दें कि कब किसी अपने के साथ लंबी बातचीत आख़िरकार वह एक असली प्रश्न सामने लाती है जिसे आप दोनों में से किसी को पूछना ज़रूरी था — उस क्षण से पहले कही गई सारी बातें शायद वहाँ तक पहुँचने के लिए ज़रूरी नींव थीं, व्यर्थ का भराव नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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