संस्कृत
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥
tatra sattvaṃ nirmalatvāt prakāśakam anāmayam sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha
अनुवाद
हे निष्पाप, इनमें सत्त्व निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और विकाररहित है; वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
सत्त्व की परिभाषा: निर्मल, प्रकाशमय, स्वस्थ — किसी भी सामान्य कसौटी पर तीनों गुणों में “सर्वश्रेष्ठ”। अध्याय की अधिक पैनी बात यह है कि यह भी बाँधता है, बस अन्य दो की तुलना में अधिक परिष्कृत आसक्तियों के द्वारा — सुख की आसक्ति और स्वयं ज्ञान की आसक्ति। यह बात आगे चलकर महत्त्वपूर्ण होती है: श्लोक 19 में बताया गया छुटकारा रजस् और तमस् की तुलना में सत्त्व को अधिक से अधिक बढ़ा लेने का विषय नहीं है, क्योंकि सत्त्व भी आत्मा को शरीर से बाँधे रखता है। तीनों गुण बाँधते हैं; उनमें अंतर केवल उस डोर के स्वरूप का है। सूक्ष्म बात यह है: “शुद्ध” धागा कहलाने वाला सत्त्व भी बाँधता है — उस सुखद स्पष्टता और उससे उत्पन्न होने वाले ज्ञान की आसक्ति के द्वारा। स्पष्ट-चित्त और संतुष्ट होना भी एक रस्सी ही है, बस सोने की; लक्ष्य तीनों से परे है, तीनों में सबसे अच्छा नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tatra sattvaṃ nirmalatvātतत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्
- उनमें, सत्त्व, निर्मल होने के कारण (tatra + sattvam + nirmalatvāt)
- prakāśakam anāmayamप्रकाशकं अनामयं
- प्रकाश देने वाला, विकार-रहित (prakāśakam + anāmayam)
- sukhasaṅgena badhnātiसुखसङ्गेन बध्नाति
- सुख की आसक्ति से बाँधता है (sukha-saṅgena + badhnāti)
- jñānasaṅgena cānaghaज्ञानसङ्गेन चानघ
- और ज्ञान की आसक्ति से, हे निष्पाप (jñāna-saṅgena + ca + anagha)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
It isn’t incidental that the taxonomy starts with sattva rather than tamas — Krishna leads with the most attractive of the three bindings before moving to the more obviously undesirable ones. Starting with the trap that looks most like virtue is the harder pedagogical move: a person guards readily against obvious vices, but rarely suspects that stainlessness and love of knowledge could themselves be the leash.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जो आसक्तियाँ गुणों जैसी दिखती हैं — जानकार बने रहने की आपकी प्रतिबद्धता, प्रसन्न मनःस्थिति की आपकी खोज — उन पर उन आसक्तियों से अधिक संदेह कीजिए जो स्पष्ट रूप से दोष हैं; जिस बंधन के अपने ऊपर होने की आप अपेक्षा नहीं करते, अक्सर वही सबसे देर तक बाँधे रखता है।
व्यावसायिक
- कमरे में सबसे सक्षम या सबसे अधिक जानकार व्यक्ति होने की आसक्ति पर नज़र रखें — जो लगन व्यावसायिकता जैसी दिखती है, वह आपको विशेषज्ञता के लिए मान्यता पाने की ज़रूरत से उतनी ही निश्चितता से बाँध सकती है, जितनी निश्चितता से कोई स्पष्ट दोष किसी और को बाँधता है।
परिवार और समाज
- ध्यान दें कि कब सामंजस्य की आपकी खोज, या परिवार में समझदार व्यक्ति के रूप में देखे जाने की चाह, अपने आप में एक आसक्ति बन जाती है — जो गुण उन लोगों के लिए नहीं, जिनकी सेवा के लिए वह है, बल्कि अपने ही लिए साधा जाए, वह भी बँधे होने का ही एक रूप है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।