संस्कृत
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
sattvaṃ rajas tama iti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ nibadhnanti mahābāho dehe dehinam avyayam
अनुवाद
हे महाबाहो, सत्त्व, रज और तम — प्रकृति से उत्पन्न ये गुण देह में रहने वाले अविनाशी देही को देह में बाँध देते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह अध्याय का मूलभूत दावा है, और इसे सटीक रूप से समझना उचित है, क्योंकि इसके लिए अलग से कोई अवधारणा-टिप्पणी नहीं है: तीन गुण हैं सत्त्व (बेसेंट इसे “सामंजस्य” कहती हैं — शुद्धता, प्रकाश, हल्कापन), रजस् (“गति” — आवेग, बेचैन सक्रियता) और तमस् (“जड़ता” — अंधकार, भारीपन, मंदता)। तीनों को “प्रकृति से उत्पन्न” कहा गया है, अर्थात् वे प्रकृति/पदार्थ की उपज हैं, आत्मा की नहीं। फिर भी वे देह में रहने वाले (देही) को “दृढ़ता से बाँधते हैं”, जिसे स्पष्ट रूप से अव्यय, अविनाशी, कहा गया है — यही वह विरोधाभास है जिसे पूरा अध्याय सुलझाता है: जिसे वास्तव में न छुआ जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है, वह भी व्यवहार में स्वयं को बँधा हुआ अनुभव कर सकता है, क्योंकि उसकी चेतना उस गुण से अनुकूलित होती है जो उस समय प्रबल हो। श्लोक 6-8 एक-एक करके प्रत्येक गुण की परिभाषा देते हैं। अध्याय की मूल स्थापना: तीन गुण — स्पष्टता, आवेग, जड़ता — अविनाशी देही को देह से बाँधते हैं। विरोधाभास पर ध्यान दें: देही अव्यय, अपरिवर्तनशील है, फिर भी किसी प्रकार बँधा हुआ है। शेष अध्याय यही बताता है कि यह बंधन कैसे काम करता है और कैसे खुलता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sattvaṃ rajas tama itiसत्त्वं रजस् तम इति
- सत्त्व, रजस् और तमस् — ये (sattvam + rajaḥ + tamaḥ + iti)
- guṇāḥ prakṛtisambhavāḥगुणाः प्रकृतिसंभवाः
- प्रकृति से उत्पन्न गुण (guṇāḥ + prakṛti-sambhavāḥ)
- nibadhnanti mahābāhoनिबध्नन्ति महाबाहो
- बाँधते हैं, हे महाबाहु (nibadhnanti + mahā-bāho)
- dehe dehinam avyayamदेहे देहिनं अव्ययं
- देह में अविनाशी देही को (dehe + dehinam + avyayam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Before verse 5 says the gunas bind, it says where they come from — prakriti, not the self. That ordering functions almost like an acquittal read before a charge: the self is cleared of authorship over sattva, rajas, and tamas in the same breath it’s told they will bind it anyway. Being exonerated as the source of a condition doesn’t excuse you from experiencing its effects — whose fault and who’s affected turn out to be two separate questions.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
All three gunas share one stated origin — “prakṛtisambhavāḥ,” born of nature — which means whatever quality currently has hold of you, restless agitation or heavy dullness included, isn’t drawn from some separate defective source running alongside the luminous one. It’s the same raw material in a different phase. That reframes the practical task less as expelling a foreign contaminant and more as shifting a mixture that was never, at the root, a different substance to begin with.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब कोई मनोदशा या विवशता आपके अंतरतम स्वरूप से उत्पन्न नहीं होती, तो इसे उससे अप्रभावित होना न समझ बैठें — यह जान लेना कि कोई चीज़ 'वास्तव में आप' नहीं है, आपको इस ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं करता कि वह इस समय आपको जिस तरह बाँधे हुए है, उससे आपको निपटना ही होगा।
व्यावसायिक
- जब किसी प्रक्रिया की विफलता स्पष्ट रूप से आपकी टीम की बनाई व्यवस्था से बाहर उत्पन्न होती है — किसी विक्रेता की डिफ़ॉल्ट सेटिंग, विरासत में मिला पुराना कॉन्फ़िगरेशन — तो केवल यह स्थापित करके न रुकें कि उसका स्रोत आप नहीं हैं; उसके प्रभाव को सँभालना फिर भी आपको ही है, इसलिए मूल कारण खोजने और सुधार करने को दो अलग-अलग काम मानें।
परिवार और समाज
- जब आप पहचानें कि परिवार के किसी सदस्य का कठिन व्यवहार उसके सच्चे स्वभाव से बाहर की किसी चीज़ से आता है — तनाव, कोई पुराना घाव — तो दोनों तथ्यों को एक साथ थामे रखें: वह उस व्यवहार का रचयिता नहीं है, और फिर भी उसके परिणामों से आप दोनों को निपटना ही है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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