संस्कृत
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
mama yonir mahad brahma tasmin garbhaṃ dadhāmy aham sambhavaḥ sarvabhūtānāṃ tato bhavati bhārata
अनुवाद
हे भारत, महद् ब्रह्म मेरी योनि है; उसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ, और उसी से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह सृष्टि-रचना का बिंब है, जैविक नहीं: कृष्ण “महान ब्रह्म” (महद् ब्रह्म — प्रकृति, आदि प्रकृति) को अपनी योनि बताते हैं, जिसमें वे वह बीज रखते हैं जो प्रत्येक प्राणी बनता है। यह जोड़ी आगे की बात के लिए महत्वपूर्ण है — प्रकृति पदार्थ देती है, कृष्ण बीज देते हैं, और श्लोक 5 का यह कथन कि गुण “प्रकृति से उत्पन्न” हैं, तभी समझ में आता है जब यह दोहरा उद्गम सामने रख दिया जाए। यहाँ प्रकृति अपने-आप से उत्पन्न होने वाली नहीं है; वह उपादान कारण है जो एक चेतन स्रोत के साथ मिलकर कार्य करता है। यह सृष्टि-वर्णन यौन बिंबों में है: महद् ब्रह्म (यहाँ प्रकृति, महान अव्यक्त) योनि है; कृष्ण उसमें गर्भ, अर्थात् चेतना का बीज, स्थापित करते हैं। प्रत्येक प्राणी वही मिलन है — गीता 13.27 का वही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संयोग।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mama yonir mahad brahmaमम योनिः महद् ब्रह्म
- महत् ब्रह्म मेरी योनि है (mama + yoniḥ + mahat + brahma)
- tasmin garbhaṃ dadhāmy ahamतस्मिन् गर्भं दधांय् अहं
- उसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ (tasmin + garbham + dadhāmi + aham)
- sambhavaḥ sarvabhūtānāṃसंभवः सर्वभूतानां
- सब प्राणियों की उत्पत्ति (sambhavaḥ + sarva-bhūtānām)
- tato bhavati bhārataततो भवति भारत
- उसी से होती है, हे भारत (tataḥ + bhavati + bhārata)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t call prakriti a rival origin or a lesser one — he calls it “my womb,” folding the material cause into his own possession before assigning himself the separate act of placing the seed within it. The image quietly refuses a common either/or, matter versus spirit, substance versus agency. Every birth described here needs both a receptive medium and a directing seed, and neither one alone produces anything.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप कुछ ऐसा रच रहे हों जो आपके लिए मायने रखता है, तो याद रखें कि उसे दोनों चीज़ों की ज़रूरत है — एक ग्रहणशील आधार, यानी समय, वातावरण और अनुशासन, और एक दिशा देने वाला संकल्प। इन दोनों में से केवल एक ही देने पर, चाहे वह कितना भी प्रबल हो, अपने-आप परिणाम नहीं मिलेगा।
व्यावसायिक
- जब कोई परियोजना अटक जाए, तो जाँचिए कि क्या आपने वे दोनों हिस्से दिए हैं जिन्हें यह श्लोक साथ रखता है — वह मंच या प्रक्रिया जो काम को ग्रहण करती है, और वह सोची-समझी दिशा जो उसका बीज बोती है। टीमें अक्सर एक पर ज़रूरत से ज़्यादा लगा देती हैं और चुपचाप दूसरे को भूखा छोड़ देती हैं।
परिवार और समाज
- जब आप किसी रिश्ते में कुछ पोषित करना चाहें — भरोसा, या किसी बच्चे का विकास — तो दोनों दें: वह ग्रहणशील स्थान जो उसे पनपने देता है, और वह सोचा-समझा ध्यान जो उसकी शुरुआत करता है। एक के बिना दूसरा शायद ही कभी वह परिणाम देता है जिसकी आप आशा कर रहे हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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