संस्कृत
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam rajasas tu phalaṃ duḥkham ajñānaṃ tamasaḥ phalam
अनुवाद
कहा गया है कि शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल होता है; किन्तु रजस् का फल दुःख है और तमस् का फल अज्ञान है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
गुणों का कार्य-कारण तर्क मृत्यु से आगे बढ़कर सामान्य कर्मफल तक जाता है: सात्त्विक कर्म का फल शुद्ध और निर्मल होता है, राजसिक कर्म का फल दुःख है, और तामसिक कर्म का फल स्वयं अज्ञान है। गीता में अन्यत्र दी गई फलों के प्रति अनासक्ति की सामान्य शिक्षा की तुलना में यह अधिक कसा हुआ और अधिक विशिष्ट दावा है — यहाँ किसी कर्म के पीछे के गुण की प्रकृति यह निर्धारित करती है कि उस कर्म से कैसा फल मिलेगा, चाहे कर्ता परिणाम से आसक्त हो या न हो। हर गुण का अपना विशिष्ट फल होता है: सत्त्व → शुद्ध फल, रजस् → दुःख, तमस् → अज्ञान। अध्याय 17 और 18 इसी त्रिविध वर्गीकरण को श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप, दान, ज्ञान, कर्म और सुख पर लागू करेंगे।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥकर्मणः सुकृतस्याहुः
- शुभ कर्म का, कहते हैं (karmaṇaḥ + sukṛtasya + āhuḥ)
- sāttvikaṃ nirmalaṃ phalamसात्त्विकं निर्मलं फलं
- फल सात्त्विक और निर्मल है (sāttvikam + nirmalam + phalam)
- rajasas tu phalaṃ duḥkhamरजसस् तु फलं दुःखं
- किंतु रजस् का फल दुःख है (rajasaḥ + tu + phalam + duḥkham)
- ajñānaṃ tamasaḥ phalamअज्ञानं तमसः फलं
- तमस् का फल अज्ञान है (ajñānam + tamasaḥ + phalam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This is a sharper claim than the Gita’s more famous teaching on non-attachment to results. It’s not saying “act without attachment and the fruit won’t matter” — it’s saying the fruit’s very character, pure, painful, or ignorant, is set by which guna produced the action, whether or not the actor was attached to the outcome. Detachment changes your relationship to the fruit; it doesn’t change what kind of fruit a rajasic or tamasic action actually grows.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यह न मान लें कि परिणाम की परवाह न करने भर से कोई जल्दबाज़ी में, खीज के साथ या आलस्य से किया गया कर्म तटस्थ हो जाता है — आप किसी कर्म में जो गुण डालते हैं, वही उससे लौटकर आने वाले फल के गुण को आकार देता है, चाहे परिणाम से आपका लगाव कितना भी रहा हो।
व्यावसायिक
- यह न मान लें कि सही भावनात्मक अनासक्ति के साथ काम सौंप देने से, जल्दबाज़ी या लापरवाही की स्थिति में किया गया काम क्षम्य हो जाता है — भीतर लगे प्रयास का गुण परिणाम में दिखाई देता ही है, चाहे आपने परिणाम की कितनी भी कम परवाह करने का दावा किया हो।
परिवार और समाज
- यह न मान लें कि परिवार के लिए किए गए किसी उपकार या व्यवहार का परिणाम कैसा निकलता है, इससे भावनात्मक रूप से अनासक्त रहने पर उसे खीज के साथ या लापरवाही से करना क्षम्य हो जाता है — कर्म के पीछे की भावना ही यह तय करती है कि वह उसे पाने वाले लोगों तक वास्तव में क्या पहुँचाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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