संस्कृत
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
guṇān etān atītya trīn dehī dehasamudbhavān janmamṛtyujarāduḥkhair vimukto'mṛtam aśnute
अनुवाद
देहधारी जीव देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों को पार करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमृतत्व को प्राप्त करता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 19 में जिस बोध की बात थी, उसे यहाँ वास्तविक पार जाना कहा गया है। यह उन तीन गुणों से परे जाना है जिनसे यह शरीर ही उत्पन्न हुआ है, और इसके साथ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और दुःख, सब एक साथ छूट जाते हैं। ध्यान देने की बात है कि कारण के बारे में यह दावा कितनी स्पष्टता से किया गया है। गुण केवल किसी सामान्य अर्थ में बंधन के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। उन्हें ठीक वही माना गया है “जिनसे सभी शरीर उत्पन्न हुए हैं”। इसलिए उनके पार जाना आत्म-सुधार नहीं है। यह देह धारण करने के पूरे आधार से ही बाहर निकल जाना है। इसी से स्वाभाविक रूप से श्लोक 21 में अर्जुन का प्रश्न उठता है: जिसने सचमुच ऐसा कर लिया हो, वह कैसा दिखता है? गुणान् अतीत्य, अर्थात् “गुणों के पार जाकर”, वही अवस्था है जिसे अध्याय 13 ने भूत-प्रकृति-मोक्ष कहा था। देही गुणों को नष्ट नहीं करता, क्योंकि वे देहसमुद्भव हैं, यानी देह धारण करने का अंग हैं। वह बस उनसे बँधा नहीं रहता। गीता 14.21 में अर्जुन अगला प्रश्न यही पूछते हैं कि ऐसा व्यक्ति कैसा दिखता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- guṇān etān atītya trīnगुणान् एतान् अतीत्य त्रीन्
- इन तीनों गुणों को पार करके (guṇān + etān + atītya + trīn)
- dehī dehasamudbhavānदेही देहसमुद्भवान्
- देहधारी, देह से उत्पन्न होने वाले (dehī + deha-samudbhavān)
- janmamṛtyujarāduḥkhairजन्ममृत्युजरादुःखैः
- जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से (janma-mṛtyu-jarā-duḥkhaiḥ)
- vimukto'mṛtam aśnuteविमुक्तोऽमृतं अश्नुते
- मुक्त होकर अमृत पाता है (vimuktaḥ + amṛtam + aśnute)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice that verse 20 doesn’t list birth, death, old age, and sorrow falling away one at a time or by degree — they drop together, in a single crossing, immediately after verse 19’s single act of recognition. The mechanism described is a threshold, not a gradient: a discontinuous exit from the whole set at once, because all four were symptoms of the same guna-bound condition rather than four separate problems to solve individually.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- यह न मान लें कि हर तरह की मुक्ति धीरे-धीरे ही आनी चाहिए — कुछ वास्तविक परिवर्तन क्रमिक ढलान नहीं, बल्कि एक दहलीज़ होते हैं, जहाँ कई पुराने संघर्ष एक साथ उसी क्षण सुलझ जाते हैं जब हर अलग लक्षण नहीं, बल्कि वास्तविक मूल स्थिति अंततः बदलती है।
व्यावसायिक
- जब किसी व्यवस्था में कई पुरानी, आपस में असंबद्ध-सी लगने वाली समस्याएँ हों, तो हर एक को कई तिमाहियों में होने वाला अलग सुधार मानने के बजाय यह जाँचें कि कहीं उन सबकी जड़ में एक ही स्थिति तो नहीं है — कुछ सुधार लक्षणों के पूरे समूह को एक साथ दूर कर देते हैं, उसी क्षण जब वास्तविक साझा कारण का समाधान किया जाता है।
परिवार और समाज
- जब किसी संबंध में कई पुराने तनाव एक ही अनसुलझे मुद्दे से उपजते प्रतीत हों, तो यह न मान लें कि आपको उन्हें एक-एक करके सुलझाना होगा — वास्तविक साझा जड़ को संबोधित करने से पूरा समूह एक साथ मिट सकता है, धीरे-धीरे, एक-एक लक्षण करके नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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