14.2

संस्कृत

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

idaṃ jñānam upāśritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca

अनुवाद

इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे स्वरूप की समानता को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के समय भी जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय व्याकुल भी नहीं होते।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

दावे का दायरा तुरंत बढ़ जाता है: यह किसी एक और मानव पुनर्जन्म से मुक्ति नहीं है, बल्कि सृष्टि (सर्ग) और प्रलय के पूरे ब्रह्माण्डीय चक्र से मुक्ति है — यानी स्वयं किसी ब्रह्माण्ड के बार-बार होने वाले जन्म और मृत्यु से। यह ज्ञान आगे चलकर जो भी निकले, श्लोक 2 अर्जुन को अभी से बता रहा है कि इसका महत्व व्यक्तिगत नहीं, ब्रह्माण्डीय है। इसीलिए यह अध्याय अगले कई श्लोकों में पहले सृष्टि-रचना से बाहर की ओर विस्तार करता है (श्लोक 3-4), और फिर व्यक्ति की दशा पर सिमट आता है (श्लोक 5 से आगे)। कृष्ण के साथ साधर्म्य — “स्वभाव की समानता” — एकरूपता नहीं, बल्कि सदृशता है: मुक्त जीव ब्रह्माण्डीय चक्र से उनकी मुक्ति में भागीदार होते हैं, पर उनमें विलीन नहीं होते। यही भेद गीता 14.19–गीता 14.20 में ब्रह्मभूय के रूप में सुरक्षित रखा गया है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

idaṃ jñānam upāśrityaइदं ज्ञानं उपाश्रित्य
इस ज्ञान का आश्रय लेकर (idam + jñānam + upāśritya)
mama sādharmyam āgatāḥमम साधर्ंयं आगताः
मेरे समान स्वरूप को प्राप्त हुए (mama + sādharmyam + āgatāḥ)
sarge'pi nopajāyanteसर्गेऽपि नोपजायन्ते
सृष्टि के समय भी जन्म नहीं लेते (sarge + api + na + upajāyante)
pralaye na vyathanti caप्रलये न व्यथन्ति च
और प्रलय में व्यथित नहीं होते (pralaye + na + vyathanti + ca)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 2 doesn’t stop at promising freedom from one more human birth — it reaches all the way to the birth and dissolution of universes themselves, and does so with no more fanfare than a routine claim. The scale-jump is worth noticing on its own: a teaching that starts sounding personal, escaping suffering, can turn out to be making a claim at a completely different order of magnitude, while the practice being pointed to underneath it hasn’t changed size at all.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आपको पता चले कि जिस आदत या अभ्यास को आप विकसित कर रहे हैं, उसका महत्व आपके पहले अनुमान से कहीं अधिक बड़ा है, तो इस विशालता को यह न बदलने दें कि आप रोज़-रोज़ वास्तव में क्या करते हैं — परिणाम का आकार और रोज़ के कर्म का आकार बिलकुल अलग-अलग चीज़ें हैं।

व्यावसायिक

  • जब किसी परियोजना का वास्तविक व्यावसायिक प्रभाव आपको बताए गए दायरे से कहीं अधिक बड़ा निकले, तो दाँव की नाटकीयता के अनुरूप अपने रोज़ के काम को बढ़ा-चढ़ाकर करने के प्रलोभन से बचें — परिणाम का आकार और अगले ठोस कदम का आकार एक-दूसरे से असंबद्ध ही रहते हैं।

परिवार और समाज

  • जब आपको एहसास हो कि घर की कोई छोटी-सी दैनिक आदत वास्तव में किसी कहीं बड़ी चीज़ की रक्षा कर रही है — परिवार की स्थिरता, किसी बच्चे की सुरक्षा की भावना — तो उससे अपनी प्रतिबद्धता बढ़ाइए, इस बात की चिंता नहीं कि उस पर कितना कुछ टिका है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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