14.27

संस्कृत

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

brahmaṇo hi pratiṣṭhā'ham amṛtasyāvyayasya ca śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca

अनुवाद

क्योंकि मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ, अविनाशी अमृत का, शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का भी।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय का यह समापन एक ऐसी अस्पष्टता को सुलझाता है जिसे श्लोक 19 और 26 अन्यथा खुला छोड़ सकते थे। यदि “मेरे स्वरूप में प्रवेश करना” और “ब्रह्म के योग्य बनना” ही लक्ष्य है, तो ऐसा लग सकता है कि कृष्ण स्वयं से आगे किसी निर्गुण-निराकार ब्रह्म की ओर संकेत कर रहे हैं। यह श्लोक इसका उलटा कहता है: स्वयं ब्रह्म उन पर टिका है — वे उसकी प्रतिष्ठा, उसका आधार हैं, और साथ ही अमृतत्व, शाश्वत धर्म और अखण्ड आनन्द के भी। यह सोच-समझकर रखा गया समापन-शिखर है, जो अध्याय को गुणों पर या ब्रह्म पर भी नहीं, बल्कि कृष्ण की अपनी प्राथमिकता पर समाप्त करता है, और यह अध्याय 15 की पुरुषोत्तम-शिक्षा की भूमिका तैयार करता है, जहाँ कृष्ण को क्षर और अक्षर दोनों से परे बताया गया है। अध्याय का अन्तिम दावा सामान्य पदानुक्रम को उलट देता है: कृष्ण ब्रह्म के भीतर नहीं हैं, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा हैं, उसका आधार और आश्रय — और इसी प्रकार अमृत (अमरता), शाश्वत धर्म और निरपेक्ष आनन्द के भी। साकार को निराकार परम के नीचे रखा गया है, ठीक वैसे ही जैसे गीता 15.18 में पुरुषोत्तम के विषय में।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

brahmaṇo hi pratiṣṭhā'hamब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहं
क्योंकि ब्रह्म का आधार मैं हूँ (brahmaṇaḥ + hi + pratiṣṭhā + aham)
amṛtasyāvyayasya caअमृतस्याव्ययस्य च
और अविनाशी अमृत का (amṛtasya + avyayasya + ca)
śāśvatasya ca dharmasyaशाश्वतस्य च धर्मस्य
और शाश्वत धर्म का (śāśvatasya + ca + dharmasya)
sukhasyaikāntikasya caसुखस्यैकान्तिकस्य च
और परम सुख का (sukhasya + ekāntikasya + ca)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

For twenty-six verses, Brahman, immortality, and dharma have all sounded like the horizon the teaching was moving toward — the largest available referents. This closing verse quietly reverses the architecture: those aren’t the foundation Krishna’s teaching rests on, they’re what rests on him. It’s a one-verse reveal that a reader could easily have missed being set up, since nothing before it explicitly said the destination and the ground were different things.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • समय-समय पर जाँचते रहें कि जिस लक्ष्य को आप अपनी सोच में सबसे बड़ा, अंतिम क्षितिज मानते आए हैं, कहीं वह स्वयं किसी और अधिक मूलभूत चीज़ पर तो नहीं टिका है, जिसकी आपने अभी तक जाँच नहीं की — किसी योजना में सबसे बड़ा सुनाई देने वाला शब्द हमेशा उसकी असली नींव नहीं होता।

व्यावसायिक

  • समय-समय पर जाँचते रहें कि जिस रणनीतिक उद्देश्य को सब अंतिम लक्ष्य मानते हैं, कहीं वह स्वयं किसी और अधिक मूलभूत क्षमता पर तो नहीं टिका है, जिसका अभी तक नाम ही नहीं लिया गया — सबसे बड़े सुनाई देने वाले लक्ष्य के पीछे भागना और उसकी असली नींव को सुरक्षित न करना, पहलों के अटक जाने का एक आम कारण है।

परिवार और समाज

  • समय-समय पर जाँचते रहें कि जिसे आप अपने परिवार का अंतिम लक्ष्य मानते आए हैं — कोई पड़ाव, कोई प्रतिष्ठा — कहीं वह स्वयं किसी और अधिक मूलभूत चीज़ पर तो नहीं टिका है, जैसे भरोसा या आपकी उपस्थिति, जिसे पहले सुरक्षित करना ज़रूरी है; सबसे बड़ा सुनाई देने वाला लक्ष्य हमेशा असली नींव नहीं होता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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