14.12

संस्कृत

लोभः प्रवृत्तिरारंभः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

lobhaḥ pravṛttir ārambhaḥ karmaṇām aśamaḥ spṛhā rajasy etāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha

अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ, जब रजोगुण बढ़ जाता है, तब लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा — ये उत्पन्न होते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

दूसरा पहचान-चिह्न: रजस् बढ़ने पर वह लोभ, बाहर की ओर बहती ऊर्जा, नए-नए कामों को बाध्यतावश शुरू करते जाना, बेचैनी और कामना के रूप में दिखता है। यह वही रूप-रेखा है जो श्लोक 7 में रजस् की परिभाषा में दी गई है — तृष्णा और कर्म के प्रति आसक्ति। पर अब यह मूल कारण के वर्णन के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे लक्षणों के रूप में दी गई है जिन्हें कोई व्यक्ति अपने भीतर उठते हुए सचमुच देख सकता है। रजस् की पहचान: लोभ (लालच), प्रवृत्ति (बाध्यकारी सक्रियता), आरम्भ (काम शुरू करना), अशम (विश्राम का अभाव), स्पृहा (लालसा)। यह एक अति-व्यस्त, बटोरते रहने वाले मन का भीतर से महसूस होने वाला अनुभव है — ऐसा मन जो शांत बैठ नहीं सकता। गीता 14.16 के अनुसार इसका फल दुःख, यानी पीड़ा, है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

lobhaḥ pravṛttir ārambhaḥलोभः प्रवृत्तिः आरंभः
लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ (lobhaḥ + pravṛttiḥ + ārambhaḥ)
karmaṇām aśamaḥ spṛhāकर्मणां अशमः स्पृहा
कर्मों का, अशान्ति, लालसा (karmaṇām + aśamaḥ + spṛhā)
rajasy etāni jāyanteरजस्य् एतानि जायन्ते
ये उत्पन्न होते हैं, जब रजोगुण (rajasi + etāni + jāyante)
vivṛddhe bharatarṣabhaविवृद्धे भरतर्षभ
बढ़ जाता है, हे भरतश्रेष्ठ (vivṛddhe + bharata-ṛṣabha)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Read against a modern lens, this list of rajas’s symptoms — greed, outward energy, launching new undertakings, restlessness, craving — is almost a description of what a hard-charging culture calls ambition. The verse doesn’t treat any of that as automatically admirable; it names it as a diagnostic of a mind currently bound, regardless of how productive the output looks from the outside.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • बेचैन ऊर्जा और लगातार नए कामों की शुरुआत को इस बात का प्रमाण न समझें कि आप फल-फूल रहे हैं — यह श्लोक ठीक इसी ढर्रे को लालसा से बँधे होने का लक्षण बताता है, कोई गुण नहीं, चाहे बाहर से वह कितना ही उत्पादक क्यों न दिखे।

व्यावसायिक

  • अथक सक्रियता और लगातार नई पहलों को अच्छे प्रदर्शन का पैमाना मानकर पुरस्कृत करने में सावधानी बरतें — इस श्लोक की सूची लगभग हूबहू उसी से मेल खाती है जो महत्वाकांक्षा जैसा दिखता है, फिर भी यह ऐसे मन का वर्णन है जो स्पष्ट दिशा से नहीं, बल्कि लालसा से संचालित है।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई निकट व्यक्ति हमेशा कुछ नया शुरू करता रहता है और कभी शांत नहीं बैठता, तो यह न मान लें कि यह केवल सराहने योग्य लगन है — देखें कि कहीं यह ऊर्जा का वेश धारण किए हुए बेचैनी और लालसा तो नहीं, और यह भी कि क्या वे सचमुच चाहेंगे कि उनसे इस बारे में पूछा जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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