17.3

संस्कृत

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥

sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata śraddhāmayo'yaṃ puruṣo yo yac-chraddhaḥ sa eva saḥ

अनुवाद

हे भारत, हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अपने अंतःस्वभाव के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही होता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह इस अध्याय की सबसे अधिक उद्धृत पंक्ति है, और यह स्पष्ट रूप से समझ लेना उचित है कि यह किस प्रकार का कथन है। यह अध्याय 2 की तत्त्वमीमांसीय शिक्षा नहीं है, जहाँ सच्ची आत्मा व्यक्ति में दिखने वाले किसी भी गुण से अछूती रहती है। यह अनुभव में आने वाले व्यक्तित्व के स्वभाव के बारे में कथन है: आप जिस पर भरोसा करते हैं, जिसका आदर करते हैं और जिसके इर्द-गिर्द अपना आंतरिक जीवन ढालते हैं, वही आपका स्वरूप बन जाता है। अध्याय 2 के आत्मा-सिद्धांत के साथ पढ़ें तो ये दोनों परस्पर विरोधी कम और अलग-अलग स्तरों पर काम करते अधिक दिखते हैं — एक बताता है कि व्यक्ति मूल रूप से क्या है, दूसरा बताता है कि व्यक्ति क्या बन जाता है। श्रद्धामयोऽयं पुरुषः… यो यच्छ्रद्धः स एव सः — “मनुष्य श्रद्धा से बना है; जैसी उसकी श्रद्धा, वैसा ही वह है।” यह गीता की सबसे अधिक उद्धृत पंक्तियों में से एक है: श्रद्धा कोई ऐसी राय नहीं जिसे व्यक्ति रखता है, बल्कि वह तत्त्व है जिससे व्यक्ति बना है, और वही तय करती है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसका मूल्य क्या है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

sattvānurūpā sarvasyaसत्त्वानुरूपा सर्वस्य
सबकी अपने अन्तःकरण के अनुरूप (sattva-anurūpā + sarvasya)
śraddhā bhavati bhārataश्रद्धा भवति भारत
श्रद्धा होती है, हे भारत (śraddhā + bhavati + bhārata)
śraddhāmayo'yaṃ puruṣoश्रद्धामयोऽयं पुरुषो
यह पुरुष श्रद्धामय है (śraddhā-mayaḥ + ayam + puruṣaḥ)
yo yac-chraddhaḥ sa eva saḥयो यच्-छ्रद्धः स एव सः
जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है (yaḥ + yat-śraddhaḥ + saḥ + eva + saḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This is the single most quoted line in the whole Gita, and its popularity outside the text is exactly what the explanation above is warning against: lifted alone, “a man is what his faith is” sounds like an eternal metaphysical claim, when in context it’s a diagnostic tool sandwiched between a question about ritual practice and three chapters of sorting food and sacrifice by guna. A quotable sentence and a well-scoped claim aren’t always the same thing.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जो सत्य इतने यादगार ढंग से कहा गया हो कि उसे संदर्भ से अलग करके उद्धृत किया जा सके, वह आपको इस ओर ले जा सकता है कि आप उसे उससे बड़ा मान लें जितना वह वास्तव में है — 'आप वही हैं जिस पर आप भरोसा करते हैं' जैसी किसी पंक्ति को अपनी आत्म-समझ बदलने देने से पहले यह जाँच लें कि वह असल में कौन-सा विशिष्ट और सीमित दावा कर रही थी।

व्यावसायिक

  • जब किसी रणनीति दस्तावेज़ की कोई प्रभावशाली एक-पंक्ति उसके मूल दायरे के बिना दोहराई जाने लगे, तो उसे परम सत्य मानने से पहले उसे उसी संदर्भ में वापस रखकर देखें जहाँ से वह आई थी — जो पंक्ति किसी प्रस्तुति में सार्वभौमिक लगती थी, उसके नीचे अक्सर एक अधिक सीमित और अधिक उपयोगी दावा होता था।

परिवार और समाज

  • यदि आपके परिवार में कोई आपकी कही किसी पुरानी पंक्ति को ऐसे दोहराए मानो वह आपके आशय से कहीं बड़ी किसी बात का निपटारा कर देती हो, तो नरमी से उसका मूल, अधिक सीमित संदर्भ बता दें — एक यादगार पंक्ति और पूरी तरह प्रमाणित दावा एक ही चीज़ नहीं हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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