17.25

संस्कृत

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥

tad ity anabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ dānakriyāś ca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ

अनुवाद

मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले लोग "तत्" का उच्चारण करके, फल की इच्छा न रखते हुए, यज्ञ और तप की क्रियाएँ तथा दान की विविध क्रियाएँ करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

“तत्” उन कर्मों को चिह्नित करता है जो मोक्ष, अर्थात् मुक्ति, चाहने वाले करते हैं, और — संयोग से नहीं — यहाँ इसे ठीक उसी अनासक्ति (अनभिसंधाय फलम्) के साथ जोड़ा गया है जिसने श्लोक 11 में सात्त्विक यज्ञ और श्लोक 17 में सात्त्विक तप को परिभाषित किया था। ॐ तत् सत् का तीन श्लोकों वाला यह क्रम वस्तुतः इस मन्त्र के माध्यम से अध्याय के पूरे सात्त्विक मानदंड को फिर से स्थापित करता है: ॐ आरम्भ करने की तत्परता के लिए, तत् फल से मुक्ति के लिए, और आगे, सत् स्वयं कर्म की गुणवत्ता के लिए। तत्, “वह”, अनभिसंधाय फलम् बोला जाता है — परिणाम को लक्ष्य बनाए बिना। यह उस फल-त्याग को चिह्नित करता है जो कर्म को एक मार्ग बना देता है: पिछले श्लोकों के सात्त्विक यज्ञ, तप और दान, जिन्हें अब मोक्ष-काङ्क्षी, अर्थात् मुक्ति के साधक, करते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

tad ity anabhisandhāya phalaṃतद् इत्य् अनभिसन्धाय फलं
'तत्' कहकर, फल की इच्छा न रखते हुए (tat + iti + anabhisandhāya + phalam)
yajñatapaḥkriyāḥयज्ञतपःक्रियाः
यज्ञ और तप की क्रियाएँ (yajña-tapaḥ-kriyāḥ)
dānakriyāś ca vividhāḥदानक्रियाश् च विविधाः
और दान की विविध क्रियाएँ (dāna-kriyāḥ + ca + vividhāḥ)
kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥक्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः
मोक्ष चाहने वालों द्वारा की जाती हैं (kriyante + mokṣa-kāṅkṣibhiḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

There’s a fitting symmetry between the syllable and what it marks: Tat is the classical Upanishadic way of gesturing at Brahman indirectly, by pointing rather than naming — and the practice this verse associates with Tat is defined the same way, by what’s absent (anabhisandhāya phalam, without aiming at fruit) rather than by any positive description of what the mokṣa-seeker is doing. The middle term of the mantra and the practice it marks are both defined by subtraction rather than assertion.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • कभी-कभी आप किस ओर बढ़ रहे हैं, इसे बताने का सबसे साफ़ तरीका यह होता है कि आपने क्या करना छोड़ दिया है — परिणाम के पीछे भागना, श्रेय की ज़रूरत — न कि उस अवस्था का कोई सकारात्मक वर्णन, क्योंकि उसकी ओर इशारा करना उसे सीधे नाम देने से आसान हो सकता है।

व्यावसायिक

  • परिणाम पर केंद्रित किसी टीम के कार्य-सिद्धांत को शब्दों में रखते समय, उसे इस आधार पर परिभाषित करना अधिक उपयोगी हो सकता है कि आप स्पष्ट रूप से किस चीज़ को साधने का प्रयास नहीं कर रहे — अल्पकालिक आँकड़े, दिखावटी जीतें — बजाय किसी ऐसे सकारात्मक लक्ष्य को बहुत विस्तार से तय करने के, जिसे ठीक-ठीक पकड़ पाना कठिन हो।

परिवार और समाज

  • यदि आप यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि बिना शर्त साथ देना कैसा दिखता है, तो शायद यह बात तब बेहतर ढंग से पहुँचे जब उसे इस रूप में बताया जाए कि उसमें क्या नहीं है — न हिसाब-किताब, न बदले की अपेक्षा — बजाय किसी सकारात्मक वर्णन के, जो ऐसा लग सकता है मानो कोई प्रदर्शन हो जिस पर खरा उतरना है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    ← 17.24अध्याय 17 · 28 में से 2517.26 →
    श्लोक पर जाएँ