17.28

संस्कृत

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapas taptaṃ kṛtaṃ ca yat asad ity ucyate pārtha na ca tat pretya no iha

अनुवाद

हे पार्थ, श्रद्धा के बिना जो कुछ भी किया जाता है, चाहे वह हवन हो, दान हो, तप हो या कोई भी कर्म, वह 'असत्' कहलाता है। वह न मृत्यु के बाद किसी काम का है, न यहाँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

समापन श्लोक अर्जुन के आरंभिक प्रश्न की ओर लौटता है, और ऐसा करते हुए जिज्ञासा की शर्तें ही बदलकर चुपचाप उसका उत्तर दे देता है। अर्जुन ने पूछा था कि जो लोग श्रद्धा से, पर शास्त्र के प्रमाण के बिना यज्ञ करते हैं, उनका क्या होता है; सत्ताईस श्लोकों के बाद कृष्ण का वास्तविक उत्तर यह है कि निर्णायक कसौटी शास्त्रीय शुद्धता कभी थी ही नहीं — निर्णायक श्रद्धा है। उसका पूर्ण अभाव किसी भी कर्म को “असत्”, निष्फल बना देता है, चाहे बाकी सब कुछ कितने ही सही ढंग से किया गया हो; और यह उस सिद्धांत का सबसे तीखा संभव कथन है जिसकी ओर यह पूरा अध्याय गुणों के अनुसार बँटी एक-एक श्रेणी के सहारे बढ़ता आया है। अध्याय का अंतिम वचन: जो कुछ भी अश्रद्धया, “बिना श्रद्धा के” किया जाता है, वह असत् है — अवास्तविक — और न च तत् प्रेत्य नो इह, “वह किसी काम का नहीं, न यहाँ, न मृत्यु के बाद।” पूरा अध्याय इसी एक बात पर आ टिकता है: कर्म उतना ही वास्तविक है जितनी उसके पीछे की श्रद्धा।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

aśraddhayā hutaṃ dattaṃअश्रद्धया हुतं दत्तं
बिना श्रद्धा के किया गया हवन, दिया गया दान (aśraddhayā + hutam + dattam)
tapas taptaṃ kṛtaṃ ca yatतपस् तप्तं कृतं च यत्
तपा गया तप और जो भी किया गया हो (tapaḥ + taptam + kṛtam + ca + yat)
asad ity ucyate pārthaअसद् इत्य् उच्यते पार्थ
हे पार्थ, 'असत्' कहलाता है (asat + iti + ucyate + pārtha)
na ca tat pretya no ihaन च तत् प्रेत्य नो इह
वह न मरने के बाद फल देता है, न यहाँ (na + ca + tat + pretya + no + iha)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

It would be easy to expect this final verse to simply add a fourth grade below tamas, but it does something structurally different: “Asat” isn’t a lower step on the same three-guna ladder the chapter has used throughout, it’s a separate axis entirely — real or void — running underneath all three gunas. A tamasic sacrifice, for all its flaws, is still a real sacrifice with real, if poor, consequences; a faithless one, this verse says, was never anything at all, “here or hereafter.” The chapter doesn’t end by ranking faithlessness worst — it ends by placing it outside the ranking altogether.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी काम को खराब ढंग से करने और उसे बिना किसी सच्चे विश्वास के करने में अंतर है — पहला एक वास्तविक प्रयास का कमज़ोर रूप है; दूसरा, चाहे कितना भी कुशल दिखे, हो सकता है आगे चलकर आपके लिए किसी सार्थक अर्थ में प्रयास गिना ही न जाए। देखें कि आप वास्तव में इनमें से कौन-सा कर रहे हैं।

व्यावसायिक

  • जिस परियोजना के पीछे सच्चा इरादा हो, वह भले ही खराब ढंग से पूरी हुई हो, सुधारी जा सकती है और फिर भी प्रयास गिनी जाती है; जो काम कुशलता से, पर बिना किसी सच्ची लगन के किया गया हो, अक्सर ऐसा निकलता है कि उससे कुछ भी टिकाऊ नहीं बना — सच्चे विश्वास की उपस्थिति को गुणवत्ता से अलग एक आयाम मानिए, उसी पैमाने का कोई निचला दर्जा नहीं।

परिवार और समाज

  • परिवार के लिए आधे मन से उपस्थित होना, बिना किसी सच्ची उपस्थिति के बस औपचारिकता निभाना, अपूर्ण पर सच्चे मन से उपस्थित होने की तुलना में कम मायने रख सकता है — उपस्थिति और गुणवत्ता अलग-अलग आयाम हैं, और यह श्लोक संकेत देता है कि दूसरे (गुणवत्ता) के कोई मायने होने के लिए पहली (सच्ची उपस्थिति) एक पूर्व-शर्त है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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