संस्कृत
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanam ātmanaḥ kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṃ tyajet
अनुवाद
काम, क्रोध और लोभ — ये नरक के तीन प्रकार के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए मनुष्य को इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
लगभग पंद्रह श्लोकों के निदान के बाद यह श्लोक अध्याय की सबसे अधिक उद्धृत की जाने वाली और व्यवहार में उतारी जा सकने वाली पंक्ति देता है: नरक का त्रिविध द्वार काम, क्रोध और लोभ है — इच्छा, क्रोध और लालच — और उपचार बस इतना है कि इन तीनों को त्याग दिया जाए। यह लगभग एक सार-संक्षेप की तरह काम करता है, जो श्लोक 7 से अब तक कही गई हर बात को तीन बातों की एक ऐसी सूची में समेट देता है जिसे सुनने वाला सचमुच अपने साथ ले जा सके और लागू कर सके — जबकि इससे पहले का चित्रण बिखरा हुआ और धीरे-धीरे परत-दर-परत बनता गया था। यह संक्षेपण स्वयं में शिक्षाप्रद है: पहले वर्णित आसुरी मन की मनोवैज्ञानिक जटिलता चाहे जितनी हो, पाठ उसके मूल को सुलझाया जा सकने वाला मानता है — तीन नामित प्रवृत्तियों तक सीमित, न कि कोई ऐसा रहस्य जिसे और सरल न किया जा सके। यह अध्याय का व्यावहारिक सार है, और इसका सबसे अधिक उद्धृत श्लोक: काम, क्रोध, लोभ — इच्छा, क्रोध, लालच — “नरक का त्रिविध द्वार।” श्लोक 7–20 में जो कुछ भी आसुरी है, वह इन्हीं तीन से निकलता है, और पूरा उपचार है त्यजेत्, “इसे त्याग दिया जाए।” यह द्वार भीतर की ओर खुलता है; बाहर निकलने का रास्ता भी वहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃत्रिविधं नरकस्येदं द्वारं
- नरक का यह तीन प्रकार का द्वार (trividham + narakasya + idam + dvāram)
- nāśanam ātmanaḥनाशनं आत्मनः
- आत्मा का नाश करने वाला (nāśanam + ātmanaḥ)
- kāmaḥ krodhas tathā lobhasकामः क्रोधस् तथा लोभस्
- काम, क्रोध और वैसे ही लोभ (kāmaḥ + krodhaḥ + tathā + lobhaḥ)
- tasmād etat trayaṃ tyajetतस्माद् एतत् त्रयं त्यजेत्
- इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए (tasmāt + etat + trayam + tyajet)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Chapter 2 traced kāma and krodha as a causal chain — desire produces anger, anger produces delusion, and so on down to ruin. This verse takes that same pair, adds lobha, and flattens the sequence into three independent gates to be renounced together, not traced in order. By this point in the text, the prescription no longer requires understanding the mechanism step by step; it’s enough to refuse entry at any of the three gates, regardless of which one a person happens to be facing first.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Strip the verse of its battlefield setting and the triad still names something immediately recognizable: compulsive wanting, reactive temper, and a scarcity mindset that hoards past any actual need — the three failure modes that show up in burnout, in workplace politics, in overspending, long before anyone calls them by their Sanskrit names. What the verse gets right, and what most modern self-help repackaging of this same triad misses, is the refusal to treat them as one undifferentiated “stress response” — they’re named as three separate problems because they call for three separate responses.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- आपके भीतर कोई बुरा ढर्रा कैसे शुरू हुआ — कामना से क्रोध, और क्रोध से और भी बुरे निर्णय — इसकी पूरी कड़ी खोजने के बाद ही आप उस पर कुछ कर सकें, ऐसा ज़रूरी नहीं है। यह श्लोक कामना, क्रोध और लोभ को तीन अलग-अलग द्वार मानता है, जिन्हें आप एक-एक करके बंद कर सकते हैं, आप इस समय जहाँ भी खड़े हों।
व्यावसायिक
- जब किसी टीम की गड़बड़ी की जड़ होड़, गुस्से या संसाधनों को अपने पास दबाकर रखने में हो, तो कुछ करने से पहले आपको इनके बीच की पूरी कारण-कड़ी का नक्शा बनाने की ज़रूरत नहीं है — हर एक को अलग उपाय की तरह लें, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक कामना, क्रोध और लोभ को एक ऐसा क्रम नहीं मानता जिसे सुलझाना पड़े, बल्कि तीन स्वतंत्र द्वार मानता है।
परिवार और समाज
- अगर किसी रिश्ते में टकराव किसी चीज़ की चाह से शुरू होकर नाराज़गी और फिर संसाधनों को लेकर सतर्कता तक बढ़ता दिखे, तो कुछ करने से पहले आपको पूरा क्रम सुलझाना ज़रूरी नहीं है — इन तीनों में से जो भी आपको अभी साफ़ दिख रहा हो, उसी को संभालें। यह श्लोक इन्हें अलग-अलग द्वार मानता है, कोई एक ऐसी कड़ी नहीं जिसे आपको शुरू से अंत तक खोजना पड़े।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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