16.4

संस्कृत

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥

dambho darpo 'bhimānaś ca krodhaḥ pāruṣyam eva ca ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

अनुवाद

हे पार्थ, दम्भ, दर्प और अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान — ये उस मनुष्य के लक्षण हैं जो आसुरी सम्पदा लेकर जन्मा है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

तीन श्लोकों और लगभग दो दर्जन अलग-अलग दैवी गुणों के बाद, आसुरी सूची केवल एक श्लोक में आती है और उसमें केवल छह बातें हैं: दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान (यानी उस ज्ञान का उलटा जिससे यह अध्याय आरम्भ हुआ था)। यह असमानता अलंकार की दृष्टि से सोची-समझी है — सद्गुण का बारीकी से विस्तार किया गया है, जबकि दुर्गुण को फूले हुए अहं और अज्ञान का एक ही अविभक्त गट्ठर मानकर निपटा दिया गया है, मानो उसके बारे में कहने को कम है क्योंकि वह मूलतः सरल है — एक कमी, न कि कोई समृद्ध वैकल्पिक संरचना। यहाँ कृष्ण अर्जुन को पार्थ (पृथा का पुत्र) कहकर संबोधित करते हैं — यह मातृकुल-सूचक नाम ग्रंथ तब अपनाता है जब वह उन्हें उनकी वंश-परम्परा की, और इसलिए वर्णित किए जा रहे चुनाव में उनके दाँव की, याद दिलाना चाहता है। आसुरी सूची छोटी है — छह शब्द — क्योंकि उसकी जड़ एक ही है: अज्ञान, न-जानना, और बाकी सब (दंभ, दर्प, कठोरता) उसी के लक्षण हैं। इसके बाद श्लोक 7–20 यह खोलकर दिखाते हैं कि यह न-जानना क्या मानता है और क्या करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

dambho darpo 'bhimānaś caदंभो दर्पो ऽभिमानश् च
दम्भ, दर्प और अभिमान (dambhaḥ + darpaḥ + abhimānaḥ + ca)
krodhaḥ pāruṣyam eva caक्रोधः पारुष्यं एव च
क्रोध और कठोरता भी (krodhaḥ + pāruṣyam + eva + ca)
ajñānaṃ cābhijātasya pārthaअज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ
और अज्ञान — उसमें जन्मे व्यक्ति के, हे पार्थ (ajñānam + ca + abhijātasya + pārtha)
sampadam āsurīmसंपदं आसुरीं
आसुरी सम्पदा (sampadam + āsurīm)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Where the preceding divine catalogue reads like a flat, simultaneous list — a person could plausibly hold all twenty-plus qualities at once with no inherent order — this six-item demonic list reads more like a plausible cascade: hypocrisy feeding arrogance, arrogance curdling into conceit, conceit erupting as wrath, wrath hardening into habitual harshness, all of it resting on ajñāna. Virtue here is a coexisting cluster; vice is a chain reaction, each link plausibly triggering the next.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप इस श्लोक की सूची की कोई छोटी-सी बात अपने भीतर देखें — अहंकार की एक झलक, कठोरता का एक क्षण — तो उसे एक अलग-थलग चूक मानने के बजाय किसी शृंखला की संभावित पहली कड़ी समझें। शृंखला को आरंभ में ही तोड़ देना उसे आदत बन जाने के बाद रोकने से कहीं आसान है।

व्यावसायिक

  • यदि आप देखें कि किसी सहकर्मी का छोटा-सा अहंकार बिना रोक-टोक के चल रहा है, तो उस पर जल्दी ध्यान दें — इस श्लोक के छह दोष एक सपाट सूची नहीं, बल्कि एक संभावित क्रमिक शृंखला की तरह पढ़े जा सकते हैं, जिसमें छोटा-सा घमंड बढ़ते-बढ़ते टीम के प्रति आदतन कठोरता बन सकता है। आप जितनी जल्दी हस्तक्षेप करेंगे, सुधार की कीमत उतनी ही कम होगी।

परिवार और समाज

  • किसी रिश्ते में बिना रोके छोड़ा गया थोड़ा-सा अभिमान या आत्म-महत्त्व शायद ही कभी छोटा बना रहता है — यह श्लोक संकेत देता है कि वह आगे बढ़कर अधिक कठोर और अधिक बार होने वाले टकराव की ओर ले जाता है। शुरुआती संकेत को नरमी से कह देना उस ढर्रे को सुलझाने से आसान है जो एक बार पक्का हो चुका हो।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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