16.18

संस्कृत

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ mām ātmaparadeheṣu pradviṣanto 'bhyasūyakāḥ

अनुवाद

अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध का आश्रय लेने वाले ये ईर्ष्यालु लोग अपने और दूसरों के शरीरों में मुझसे द्वेष करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक असामान्य रूप से सीधा धर्मशास्त्रीय दावा करता है: अहंकार और क्रोध के वश में पड़े ये द्वेषी लोग “दूसरों के और अपने शरीरों में मुझसे द्वेष करते हैं।” इसका निहितार्थ यह है कि ईश्वर हर शरीर में सचमुच उपस्थित है — रूपक के रूप में नहीं — इसलिए किसी भी प्राणी के प्रति, स्वयं अपने प्रति भी, किया गया द्वेष उस अंतर्यामी उपस्थिति के प्रति शत्रुता के रूप में दर्ज होता है। यह दावा अध्याय 13 और 15 में चलने वाली सार्वभौमिक आत्मा की शिक्षा से मेल खाता है। यह क्रूरता और आत्म-घृणा, दोनों को एक नए रूप में प्रस्तुत करता है: इस ग्रंथ की अपनी शब्दावली में, ये इस बारे में एक प्रकार की श्रेणी-भूल हैं कि वास्तव में हानि किसकी हो रही है। सबसे तीखी पंक्ति यह है: वे मुझसे द्वेष करते हैं — भीतर बसी आत्मा से — “अपने और दूसरों के शरीरों में।” आसुरी स्वभाव उसी उपस्थिति से युद्ध में है जिसे, गीता 6.29 के अनुसार, योगी सर्वत्र समान रूप से देखता है। इसकी जड़ अहंकार है, और इसका निशाना वह आत्मा है जिसे अहंकार ढक देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃअहङ्कारं बलं दर्पं
अहंकार, बल, घमंड (ahaṅkāram + balam + darpam)
kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥकामं क्रोधं च संश्रिताः
काम और क्रोध का आश्रय लिए हुए (kāmam + krodham + ca + saṃśritāḥ)
mām ātmaparadeheṣuमां आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझे (mām + ātma-para-deheṣu)
pradviṣanto 'bhyasūyakāḥप्रद्विषन्तो ऽभ्यसूयकाः
द्वेष करते हुए, दोष निकालने वाले (pradviṣantaḥ + abhyasūyakāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Most ethical frameworks treat harm to oneself and harm to others as different categories — one self-regarding, one other-regarding, often carrying different moral weight. This verse collapses that distinction by naming both, in a single compound, as identical hatred: “in their own body and in others’.” Self-contempt and cruelty toward someone else are named here as the same act aimed at the same target, not two separate failings requiring two separate corrections.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि आप अपने आप से जिस कठोर भीतरी स्वर में बात करते हैं और दूसरों के प्रति जो अधीरता दिखाते हैं, वे दो अलग-अलग समस्याएँ नहीं, बल्कि एक ही मूल चूक हो सकती हैं — यह श्लोक अपने प्रति और दूसरों के प्रति शत्रुता को एक ही बताता है। आप अपने साथ जैसा व्यवहार करते हैं, उस पर काम करना दूसरों के साथ आपके व्यवहार को आपकी अपेक्षा से कहीं अधिक सुधार सकता है।

व्यावसायिक

  • यदि कोई मैनेजर अपने प्रति असामान्य रूप से कठोर है — हमेशा सबसे पहले खुद की आलोचना करता है, कभी संतुष्ट नहीं होता — तो यह मानकर चलें कि वही कठोरता देर-सवेर टीम के प्रति भी सामने आएगी। यह श्लोक अपने प्रति और दूसरों के प्रति शत्रुता को एक ही ढर्रा मानता है; प्रदर्शन-समीक्षाओं में समस्याएँ दिखने से पहले यह पहचान का एक उपयोगी साधन है।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई करीबी अपनी विफलताओं के बारे में बात करते हुए लगातार अपने प्रति क्रूर रहता है, तो हैरान न हों जब वही कठोरता अंततः आपके या दूसरों के प्रति सामने आए — यह श्लोक दोनों को एक ही कृत्य बताता है। किसी को अपने प्रति नरम होने में मदद करना, बाकी सबके साथ उसके व्यवहार को नरम करने का अधिक सीधा रास्ता हो सकता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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