16.15

संस्कृत

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥

āḍhyo 'bhijanavān asmi ko 'nyo 'sti sadṛśo mayā yakṣye dāsyāmi modiṣya ity ajñānavimohitāḥ

अनुवाद

"मैं धनवान हूँ, ऊँचे कुल में जन्मा हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा।" — इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह एकालाप हैसियत की गिनती के साथ समाप्त होता है — धन, ऊँचा कुल, “मेरे जैसा और कौन है” — और फिर कर्मकांड की तीन क्रियाओं की ओर मुड़ जाता है: मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा। विडंबना यह है कि ये सचमुच धार्मिक और नैतिक कर्म (यज्ञ, दान) हैं, जिन्हें पूरी तरह आत्म-प्रशंसा के स्वर की सेवा में लगा दिया गया है; यहाँ ग्रंथ यज्ञ या दान पर आपत्ति नहीं कर रहा, केवल उन्हें ट्रॉफ़ी की तरह करने पर। “इस प्रकार अज्ञान से मोहित” इस आंतरिक एकालाप को समाप्त करता है और आगे आने वाले परिणाम के लिए उसे फिर से अन्य पुरुष के वर्णन को सौंप देता है। आसुरी प्रकृति वाले व्यक्ति के यज्ञ और दान भी इसी एकालाप में समेट लिए जाते हैं — यक्ष्ये, दास्यामि, “मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा” — श्रेष्ठता के और प्रमाणों के रूप में। गीता 16.17 इन्हें नाम-यज्ञ कहती है, केवल नाम का यज्ञ, “दिखावे से”।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

āḍhyo 'bhijanavān asmiआढ्यो ऽभिजनवान् अस्मि
'मैं धनवान और कुलीन हूँ (āḍhyaḥ + abhijanavān + asmi)
ko 'nyo 'sti sadṛśo mayāको ऽन्यो ऽस्ति सदृशो मया
मेरे समान दूसरा कौन है? (kaḥ + anyaḥ + asti + sadṛśaḥ + mayā)
yakṣye dāsyāmi modiṣyaयक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य
मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा' (yakṣye + dāsyāmi + modiṣye)
ity ajñānavimohitāḥइत्य् अज्ञानविमोहिताः
इस प्रकार अज्ञान से मोहित (iti + ajñāna-vimohitāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“Who else is there like me” is grammatically a question but functions as a door closing, not opening — unlike Arjuna’s genuine questions to Krishna elsewhere in the text, this one isn’t actually seeking an answer; it’s structured so that no name could possibly be supplied. The whole chapter’s demonic monologue turns out to contain exactly one piece of interrogative grammar, and it’s the least genuinely open moment in it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि कब आप स्वयं से या दूसरों से जो प्रश्न पूछते हैं, वह वास्तव में जिज्ञासा का रूप धरे एक बंद दरवाज़ा होता है — 'मेरे जितना अच्छा यह काम और कौन कर सकता है' शायद ही कभी कोई उत्तर चाहता है। सच्चा प्रश्न इस बात के लिए खुला रहता है कि उसका उत्तर आपकी अपेक्षा से अलग भी हो सकता है; यह श्लोक दिखाता है कि जब प्रश्न ऐसा नहीं रहता, तब वह कैसा दिखता है।

व्यावसायिक

  • जब कोई सहकर्मी बैठक में ऐसा आलंकारिक प्रश्न रखे जो वास्तव में असहमति को आमंत्रित नहीं करता — 'मेरे जैसा रिकॉर्ड और किसके पास है' — तो उसे उसके असली रूप में पहचानें: बंद, खुला नहीं। जान-बूझकर उसकी तुलना किसी सच्चे प्रश्न से करें, ऐसे प्रश्न से जिसमें कोई अलग उत्तर सचमुच स्वागत-योग्य हो।

परिवार और समाज

  • यदि आप स्वयं को किसी प्रियजन से ऐसा प्रश्न पूछते हुए पकड़ें जो वास्तव में उनके उत्तर के लिए खुला नहीं है — 'मुझसे बेहतर तुम्हें कौन समझता है' — तो ध्यान दें कि आपने बातचीत शुरू नहीं की, बल्कि एक आलंकारिक चाल चली है। यह श्लोक ठीक इसी ढर्रे को दिखाता है, जिसे आदत बनने से पहले पकड़ लेना उचित है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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