16.10

संस्कृत

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वाऽसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥

kāmam āśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ mohād gṛhītvā'sadgrāhān pravartante 'śucivratāḥ

अनुवाद

कभी न भरने वाली कामनाओं का सहारा लेकर, दम्भ, अभिमान और मद से भरे हुए, मोह के कारण झूठी धारणाओं को पकड़कर, अपवित्र व्रतों वाले वे लोग कर्म में लगे रहते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यहाँ इच्छा को स्पष्ट रूप से “दुष्पूर” कहा गया है — अतृप्त, जिसे भरना असंभव है — और यह शब्द सचमुच दार्शनिक भूमिका निभा रहा है: समस्या चीज़ों को चाहना नहीं, बल्कि ऐसे ढंग से चाहना है जिसकी बनावट ही तलहीन है। दंभ, अभिमान और प्रतिष्ठा का मद एक मोह को पोषित करते हैं, जो उन्हें “असद्ग्राहान्” — मिथ्या या दूषित धारणाओं — को पकड़ने और “अशुचिव्रताः” — अशुद्ध व्रतों — के अधीन कर्म करने की ओर ले जाता है। यह अंतिम पद लगभग अपने-आप में विरोधाभास है, क्योंकि व्रत सामान्यतः एक पवित्र, अनुशासित संकल्प का नाम है; इसे अशुद्धता पर लागू करना यह संकेत देता है कि ये लोग अपने दुर्गुणों में संकल्प की वही तीव्रता लाते हैं जो कोई साधक तपस्या में लाता। कामं दुष्पूरम् — “वह काम जो भरा नहीं जा सकता” — फिर से गीता 3.39 की “अतृप्त अग्नि” ही है। आसुरी जीवन एक ऐसी चाह के इर्द-गिर्द संगठित होता है जो खिलाने से बढ़ती है, और इसीलिए कितना भी पा लेना (गीता 16.13) उसे कभी शांत नहीं करता।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kāmam āśritya duṣpūraṃकामं आश्रित्य दुष्पूरं
कभी तृप्त न होने वाले काम का आश्रय लेकर (kāmam + āśritya + duṣpūram)
dambhamānamadānvitāḥदंभमानमदान्विताः
दम्भ, मान और मद से युक्त (dambha-māna-mada-anvitāḥ)
mohād gṛhītvā'sadgrāhānमोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान्
मोह के कारण असत् आग्रहों को पकड़कर (mohāt + gṛhītvā + asat-grāhān)
pravartante 'śucivratāḥप्रवर्तन्ते ऽशुचिव्रताः
अशुद्ध व्रतों वाले वे कर्म में लगे रहते हैं (pravartante + aśuci-vratāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The word choice here is precise in a way easy to skate past: duṣpūra doesn’t mean desire is condemned outright, only desire of a particular structure — the kind built to never reach completion. That’s a narrower claim than “wanting things is wrong,” and it quietly leaves room for a desire that can actually be satisfied and released, a distinction the text needs if it isn’t going to contradict its own later acknowledgment that desire has a legitimate place in embodied life.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने भीतर की किसी चाह को केवल अत्यधिक कहकर उसकी निंदा करने से पहले स्वयं से पूछिए कि क्या यह ऐसी इच्छा है जो सचमुच पूरी होकर छोड़ी जा सकती है, या ऐसी है जो अपने स्वभाव से ही कभी पूर्ण न होने के लिए बनी है — यह श्लोक वास्तव में दूसरी प्रकार की प्रक्रिया पर प्रहार करता है, चाहने मात्र पर नहीं।

व्यावसायिक

  • जब किसी टीम की महत्वाकांक्षा अस्वस्थ दिखने लगे, तो भेद कीजिए: एक वह लक्ष्य जिसकी कोई वास्तविक अंतिम रेखा है, और दूसरा वह जिसकी बनावट ही ऐसी है कि चाहे जितना भी हासिल हो जाए वह कभी पर्याप्त न लगे — इस श्लोक की आलोचना विशेष रूप से दूसरे, अथाह प्रकार पर है, स्वयं महत्वाकांक्षा पर नहीं।

परिवार और समाज

  • यदि आपका कोई निकट व्यक्ति चाहे जितना भी पा ले, फिर भी और अधिक चाहता दिखे, तो उसे केवल लालची कहकर ठप्पा लगाने के बजाय उस प्रवृत्ति को ठीक-ठीक नाम दीजिए — एक ऐसी इच्छा जो कभी स्वयं को पूर्ण न करने के लिए बनी है। इस श्लोक का सटीक लक्ष्य चाह की बनावट है, स्वयं चाहना नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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