संस्कृत
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate
अनुवाद
जो वचन किसी को उद्वेग न पहुँचाए, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और साथ ही स्वाध्याय का अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ सत्यम् पर लगी शर्त पर ध्यान दें: तप माने जाने के लिए केवल सच्ची वाणी पर्याप्त नहीं है, उसे प्रिय-हित, अर्थात् प्रिय और हितकारी भी होना चाहिए — यह उस पुरानी भारतीय नैतिक उक्ति का ही एक रूप है कि सत्य को कोमलता से कहा जाना चाहिए, हथियार की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए। इस अनुशासन को स्वाध्याय, अर्थात् शास्त्रों के अध्ययन के अभ्यास, के साथ जोड़ने से “वाणी का तप” उसे भी समेट लेता है जो आप दूसरों से कहते हैं और उसे भी जो आप ग्रहण करते हैं — एक ऐसे गुण की असामान्य रूप से संतुलित परिभाषा, जिसे अक्सर मात्र संयम तक सीमित कर दिया जाता है। वाणी का तप: ऐसे शब्द जो सत्य (सच्चे), प्रिय (कोमल), हित (सहायक), अनुद्वेगकर (उद्विग्न न करने वाले) हों — चारों एक साथ — और साथ में स्वाध्याय, पाठ और अध्ययन। चारों में सबसे कठिन प्रायः सत्य के साथ प्रिय-हित को निभाना होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- anudvegakaraṃ vākyaṃअनुद्वेगकरं वाक्यं
- ऐसी वाणी जो उद्वेग न पहुँचाए (anudvega-karam + vākyam)
- satyaṃ priyahitaṃ ca yatसत्यं प्रियहितं च यत्
- जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो (satyam + priya-hitam + ca + yat)
- svādhyāyābhyasanaṃ caivaस्वाध्यायाभ्यसनं चैव
- और स्वाध्याय का अभ्यास (svādhyāya-abhyasanam + ca + eva)
- vāṅmayaṃ tapa ucyateवाङ्मयं तप उच्यते
- वाणी का तप कहा जाता है (vāṅ-mayam + tapaḥ + ucyate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
It’s worth noticing that svādhyāya, scriptural study, gets folded into “austerity of speech” even though it looks more like intake than output. In an oral culture where scripture was recited and studied aloud, the line between what you speak and what you take in blurs, and the verse seems to want exactly that: disciplining your speech isn’t complete if you only watch what leaves your mouth and never examine what you’re filling your mind with to say.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपनी वाणी को अनुशासित करना केवल इस पर ध्यान देना नहीं है कि आप क्या कहते हैं — इसमें यह भी शामिल है कि आप सोच-समझकर तय करें कि आप क्या पढ़ते हैं, क्या देखते हैं और क्या ग्रहण करते हैं, क्योंकि अंततः आपके भीतर से जो निकलता है, वह उसी का परिणाम होता है जो आप भीतर डालते रहे हैं।
व्यावसायिक
- यदि आप काम पर अधिक सावधानी से संवाद करने का प्रयास कर रहे हैं, तो केवल अपने भेजे जाने वाले संदेशों को सुधारने पर न रुकें — यह भी जाँचें कि आप क्या ग्रहण कर रहे हैं: वे राय, वे ग्रुप चैट, वे स्रोत, जो उस दृष्टिकोण को आकार दे रहे हैं जिसका सहारा आप लेते हैं, क्योंकि जो ग्रहण करते हैं उस पर अनुशासन के बिना जो कहते हैं उस पर अनुशासन शायद ही टिक पाता है।
परिवार और समाज
- परिवार के सदस्यों के साथ अपने लहजे पर ध्यान देना अनुशासन का केवल आधा भाग है — आप अन्यत्र जो ग्रहण करते हैं, जैसे समाचार, बहसें, दूसरों की शिकायतें, वही तय करता है कि घर पर आपके मुँह से क्या निकलता है, इसलिए जो भीतर जाता है वह भी उतने ही ध्यान का पात्र है जितने स्वयं शब्द।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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