15.5

संस्कृत

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाः अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥

nirmānamohā jitasaṅgadoṣāḥ adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ dvandvair vimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñair gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṃ tat

अनुवाद

जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में स्थित रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूरी तरह निवृत्त हो गई हैं और जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं, वे मोहरहित ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह मुक्त पुरुष के लक्षणों वाला श्लोक है, उसी प्रकार का जैसा अध्याय 2 का स्थितप्रज्ञ वाला अंश और अध्याय 12 में प्रिय भक्त के लक्षणों की सूची है, यद्यपि यह उनसे छोटा है: मान और मोह से मुक्त, आसक्ति के दोष को जीत चुका, निरंतर आत्मा में स्थित, द्वन्द्वों से छूटा हुआ — सुख और दुःख के वे जोड़े, जिन्हें गीता आरंभ से अंत तक बंधन की मूल इकाई मानती है (2.14, 2.45)। ध्यान देने योग्य बात इसका क्रम है: श्लोक पहले मानसिक दोषों का नाम लेता है और उसके बाद उस साधना का, जो उनका स्थान लेती है। इससे लगता है कि दोषों को दूर करना आत्मा में सकारात्मक तल्लीनता से पहले की अवस्था माना गया है, उसके साथ-साथ चलने वाली नहीं। मूल पाठ पर टिप्पणी: छपे हुए पृष्ठ पर यह समासयुक्त वाक्य चार पंक्तियों में बँटा है और पृष्ठ के किनारे पर एक शब्द बीच में योजक-चिह्न से टूट गया है (सुखदुःखसंज्ञै- / र्गच्छन्त्यमूढाः); यहाँ उस शब्द को जोड़कर तीसरे पाद के अंत में उसके उचित स्थान पर रखा गया है। कटे हुए वृक्ष के उस पार कौन पहुँचता है: फिर वही स्थितप्रज्ञ — मान से, पसंद-नापसंद की प्रतिक्रिया से और द्वन्द्वों से मुक्त। यह अध्याय पूरे मार्ग को बार-बार उसी आंतरिक अवस्था पर ले आता है, जिसका वर्णन अध्याय 2 से होता आ रहा है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

nirmānamohā jitasaṅgadoṣāḥनिर्मानमोहा जितसङ्गदोषाः
मान और मोह से रहित, आसक्ति के दोष को जीत चुके (nir-māna-mohāḥ + jita-saṅga-doṣāḥ)
adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
सदा अध्यात्म में स्थित, कामनाओं से पूरी तरह निवृत्त (adhyātma-nityāḥ + vinivṛtta-kāmāḥ)
dvandvair vimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñairद्वन्द्वैः विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः
सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त (dvandvaiḥ + vimuktāḥ + sukha-duḥkha-saṃjñaiḥ)
gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṃ tatगच्छन्त्य् अमूढाः पदं अव्ययं तत्
मोहरहित जन उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं (gacchanti + amūḍhāḥ + padam + avyayam + tat)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Read the order carefully: pride, delusion, and attachment are named and removed before self-abidance and desire-pacification are described — the negative work precedes the positive practice rather than running alongside it. This isn’t incidental sequencing; it implies that positive absorption in the Self doesn’t simply crowd out these faults on its own, they need to be dealt with first. It’s the same genre as the sthitaprajna portrait in chapter 2, but its ordering makes an argument the earlier passage left implicit.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • यह न मान लें कि कोई नई अच्छी आदत अहंकार या आसक्ति जैसे किसी पुराने दोष को अपने-आप हटा देगी। इस श्लोक का क्रम संकेत देता है कि अक्सर आपको पहले उस दोष से सीधे निपटना होता है, और फिर साफ़ हुई ज़मीन पर उसकी जगह लेने वाला अभ्यास खड़ा करना होता है।

व्यावसायिक

  • कोई नया सकारात्मक तरीका — मनोवैज्ञानिक सुरक्षा, बिना दोषारोपण वाली समीक्षा बैठकें — शुरू करने से पहले उन ख़ास बिगड़े हुए व्यवहारों से निपटें जो अब भी सक्रिय हैं, जैसे दोषी ढूँढ़ना या अहं से प्रेरित होकर श्रेय बटोरना। कोई नया तरीका शायद ही कभी अपने-आप किसी पुराने दोष को हटाता है; पहले उसे हटाने का क्रम रखें।

परिवार और समाज

  • साझा रीति-रिवाजों या साथ बिताए अच्छे समय से किसी तनावग्रस्त रिश्ते के सुधरने की उम्मीद करने से पहले, उसके नीचे बैठे ख़ास दोष — कोई मनमुटाव, आहत अहं — से सीधे निपटें। जब वह दोष सचमुच दूर हो चुका हो, तब सकारात्मक अभ्यास कहीं बेहतर काम करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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