संस्कृत
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
yo mām evam asaṃmūḍho jānāti puruṣottamam sa sarvavid bhajati māṃ sarvabhāvena bhārata
अनुवाद
हे भारत, जो मोह से रहित होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सब कुछ जानने वाला पूरे भाव से मेरी भक्ति करता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अब अध्याय अपना फल बताता है: मोहरहित होकर कृष्ण को पुरुषोत्तम के रूप में जानना मनुष्य को “सर्वज्ञ” बनाता है और उसे “सम्पूर्ण भाव से” (सर्वभावेन) उपासना की ओर ले जाता है। यह वाक्यांश तत्त्व-ज्ञान को सीधे सम्पूर्ण भक्तिमय झुकाव से जोड़ता है, उन्हें दो अलग-अलग मार्ग नहीं मानता। यह उस ढंग के अनुरूप है जिससे गीता सामान्यतः ज्ञान और भक्ति के बीच के तनाव को सुलझाती है: यहाँ सही ज्ञान भक्ति का प्रतिद्वंद्वी नहीं बताया गया, बल्कि वह है जो भक्ति को पूर्ण बनाता है। कृष्ण को पुरुषोत्तम के रूप में जानना मनुष्य को सर्ववित्, “सब कुछ जानने वाला” बनाता है — क्योंकि यही वह ज्ञान है जिसमें बाकी सब समाया है — और इसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है भजति सर्वभावेन, “सम्पूर्ण भाव से उपासना करता है।” ज्ञान और भक्ति एक ही क्रिया हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yo mām evam asaṃmūḍhoयो मां एवं असंमूढो
- जो मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार (yaḥ + mām + evam + asaṃmūḍhaḥ)
- jānāti puruṣottamamजानाति पुरुषोत्तमं
- पुरुषोत्तम जानता है (jānāti + puruṣottamam)
- sa sarvavid bhajati māṃस सर्वविद् भजति मां
- वह सर्वज्ञ मुझे भजता है (saḥ + sarva-vit + bhajati + mām)
- sarvabhāvena bhārataसर्वभावेन भारत
- सम्पूर्ण भाव से, हे भारत (sarva-bhāvena + bhārata)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The chapter resolves its own jnana/bhakti tension in a single phrase: knowing Krishna as Purushottama moves one to worship “with the whole being,” which means the knowledge isn’t a competing track alongside devotion, it’s what makes the devotion complete. Understanding and wholehearted commitment are presented as the same motion, arriving together rather than as two separate achievements a person has to choose between.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जिस चीज़ की आपको परवाह है, उसे गहराई से समझने और पूरे मन से उसके प्रति समर्पित होने को अलग-अलग, आपस में होड़ करने वाले रास्ते न मानें। जो आपके लिए मायने रखता है, उसकी सच्ची समझ से उसके प्रति आपकी भक्ति पूर्ण होनी चाहिए, न कि वह सचमुच उसके लिए उपस्थित रहने की ज़रूरत की जगह ले ले।
व्यावसायिक
- किसी उत्पाद पर गहरी तकनीकी महारत को उस ग्राहक के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता का विकल्प न बनने दें, जिसकी वह सेवा करता है — समझ और ग्राहक के प्रति पूरी लगन आपस में प्रतिद्वंद्वी प्राथमिकताएँ नहीं हैं। इस श्लोक की बात यह है कि ज्ञान भक्ति को पूर्ण करता है, और यही तर्क विशेषज्ञता पर और उन लोगों की परवाह पर भी लागू होता है जिनके लिए आप निर्माण करते हैं।
परिवार और समाज
- परिवार के किसी सदस्य के स्वभाव और अतीत की बौद्धिक समझ को इस बात का विकल्प न बनने दें कि आप सचमुच पूरे मन से उसके लिए उपस्थित रहें। किसी व्यक्ति के बारे में आपका ज्ञान उसके प्रति आपकी भक्ति को पूर्ण करे, न कि चुपचाप साथ रहने के कठिन काम की जगह ले ले।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।