संस्कृत
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
dvāv imau puruṣau loke kṣaraś cākṣara eva ca kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho 'kṣara ucyate
अनुवाद
इस लोक में दो पुरुष हैं — क्षर और अक्षर। समस्त प्राणी क्षर हैं, और कूटस्थ को अक्षर कहा जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अध्याय का तकनीकी केंद्र एक औपचारिक वर्गीकरण से शुरू होता है: संसार में दो पुरुष हैं, क्षर (नश्वर, जिसे सभी प्राणियों के रूप में पहचाना गया है) और अक्षर (अविनाशी, जिसे कूटस्थ कहा गया है — शाब्दिक अर्थ “शिखर पर स्थित”, यानी अपरिवर्तनशील, निहाई की तरह)। यह द्वैत मोटे तौर पर उस क्षेत्र/क्षेत्रज्ञ के भेद से मेल खाता है जिसे विकसित करने में अध्याय 13 पूरा लगा था, पर यह उसे अधिक कठोर और वर्गीकरण वाली भाषा में दोबारा कहता है, और तीसरे पद — पुरुषोत्तम — की भूमिका तैयार करता है, जिसे श्लोक 17-18 इस द्वैत को तोड़कर खोलने के लिए सामने लाएँगे। अध्याय का केंद्रीय भेद: क्षर पुरुष = सभी नश्वर प्राणी; अक्षर पुरुष = अपरिवर्तनशील (कूटस्थ, अविकारी साक्षी)। गीता 15.17 इन दोनों से ऊपर एक तीसरे का नाम लेगा — और इसी से इस अध्याय का शीर्षक बनता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- dvāv imau puruṣau lokeद्वाव् इमौ पुरुषौ लोके
- संसार में ये दो पुरुष हैं (dvau + imau + puruṣau + loke)
- kṣaraś cākṣara eva caक्षरश् चाक्षर एव च
- क्षर और अक्षर (kṣaraḥ + ca + akṣaraḥ + eva + ca)
- kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāniक्षरः सर्वाणि भूतानि
- सभी प्राणी क्षर हैं (kṣaraḥ + sarvāṇi + bhūtāni)
- kūṭastho 'kṣara ucyateकूटस्थो ऽक्षर उच्यते
- कूटस्थ को अक्षर कहा जाता है (kūṭa-sthaḥ + akṣaraḥ + ucyate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verse sets up a clean binary — perishable and imperishable, kshara and akshara — with a precision that makes it feel complete. It isn’t meant to stay that way: the whole point of naming this taxonomy so starkly is to give the next two verses something definite to overturn. A binary this tidy, appearing this deliberately, is usually a setup rather than a final answer.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Kūṭastha, glossed here as “unchanging,” literally means standing at the top of a kūṭa — an anvil or a hammer-block, the fixed point that stays put while blow after blow lands on it. That’s a sharper image than plain changelessness: the akshara isn’t proposed as something untouched by events but as something that holds its position under continuous impact. The taxonomy reads differently once you notice it defines stability as what absorbs force without moving, not as what force never reaches.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप पाएँ कि आप अपने बारे में किसी कठिन प्रश्न को कोरे 'या यह या वह' में बाँट रहे हैं — स्थिर या परिवर्तनशील, मज़बूत या कमज़ोर — तो उस द्वैत को अंतिम उत्तर न मानें, बल्कि उसे किसी तीसरे, अधिक सच्चे विकल्प की संभावित भूमिका समझें।
व्यावसायिक
- जब काम पर कोई तकनीकी बहस सिमटकर दो साफ़-सुथरे विकल्पों में बदल जाए — ख़ुद बनाएँ या ख़रीदें, केंद्रीकरण या विकेंद्रीकरण — तो इस पर संदेह करें कि यह ढाँचा स्वयं कोई व्यावहारिक तीसरा विकल्प छिपा रहा है। टीम के किसी भी एक छोर को चुनने से पहले अपना यह संदेह स्पष्ट रूप से कह दें।
परिवार और समाज
- जब किसी पारिवारिक असहमति को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि एक व्यक्ति पूरी तरह सही है और दूसरा पूरी तरह ग़लत, तो किसी का पक्ष लेने से पहले उस तीसरी स्थिति को खोजें जिसे यह द्वैत संभवतः छिपा रहा है। 'या यह या वह' वाले साफ़-सुथरे ढाँचे गहराई से देखने पर शायद ही टिक पाते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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