15.9

संस्कृत

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇam eva ca adhiṣṭhāya manaś cāyaṃ viṣayān upasevate

अनुवाद

यह कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक में, तथा मन में भी अधिष्ठित होकर विषयों का सेवन करता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

दृष्टि का दायरा अब और सिमट जाता है। पहले बात यह थी कि आत्मा इन्द्रियों को एक शरीर से दूसरे शरीर तक ले जाती है। अब बात यह है कि एक ही शरीर के भीतर क्षण-क्षण यह क्रिया कैसे चलती है। आत्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक में अपना स्थान ग्रहण करती है, और छठे के रूप में मन में भी। उसी आसन से वह विषयों का भोग करती है। यह श्लोक वर्णन करता है, निर्देश नहीं देता। पाठ अभी पाठक को यह नहीं बता रहा कि इस तथ्य के साथ क्या करना है। वह बात श्लोक 10-11 में मूढ़ों और ज्ञान-चक्षु वालों के अंतर के रूप में आती है। यह श्लोक बस सामान्य देहधारी अनुभव की संरचना सामने रखता है, ताकि अगला श्लोक यह पूछ सके कि वास्तव में इसे स्पष्ट रूप से कौन देखता है। नए शरीर में स्थित होकर आत्मा पाँच इन्द्रियों और मन की “अधिष्ठाता” बनती है। उनके माध्यम से वह उपसेवते विषयान्, यानी फिर से विषयों के सेवन में लग जाती है। गीता 15.2 में बताई गई नीचे की ओर फैली जड़ों का चक्र फिर से शुरू हो जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ caश्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च
कान, आँख और त्वचा (śrotram + cakṣuḥ + sparśanam + ca)
rasanaṃ ghrāṇam eva caरसनं घ्राणं एव च
जीभ और नाक भी (rasanam + ghrāṇam + eva + ca)
adhiṣṭhāya manaś cāyaṃअधिष्ठाय मनश् चायं
और मन का आश्रय लेकर यह (adhiṣṭhāya + manaḥ + ca + ayam)
viṣayān upasevateविषयान् उपसेवते
विषयों का सेवन करता है (viṣayān + upasevate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse is content to only describe — it maps the architecture of ordinary perception, ear to eye to mind, without yet telling the reader what to make of it. The evaluative move, the split between the deluded and the wisdom-eyed, waits for verse 10. There’s a discipline in that patience: establishing accurately how something works before rushing to judge it as good or bad is treated here as its own necessary step, not a delay before the real point.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपनी किसी आदत या प्रतिक्रिया को अच्छा या बुरा ठहराने से पहले, एक बार ईमानदारी से केवल यह बताने की कोशिश करें कि वह असल में कैसे काम करती है — उसे क्या चीज़ जगाती है और वह आपके लिए क्या करती है। जब पहले उसकी कार्यप्रणाली को ठीक-ठीक समझ लिया जाता है, तो फ़ैसला कहीं बेहतर बैठता है।

व्यावसायिक

  • बार-बार होने वाली किसी गड़बड़ी का समाधान सुझाने से पहले, सोच-समझकर एक बार केवल यह बताएँ कि सिस्टम इस समय कैसे काम कर रहा है, बिना कोई राय बनाए। जब तक कार्यप्रणाली को ठीक से समझ न लिया जाए, तब तक कोई उपाय सुझाने से बचें — फ़ैसले से पहले निदान को अपना अलग समय मिलना चाहिए।

परिवार और समाज

  • परिवार का कोई सदस्य किसी ख़ास ढंग से प्रतिक्रिया करे, तो उस पर कोई फ़ैसला सुनाने से पहले कुछ पल रुककर उस ढर्रे को केवल वैसा ही बताएँ जैसा आप देख रहे हैं, उसे अभी अच्छा या बुरा कहे बिना। पहले कार्यप्रणाली को समझ लेने से अक्सर यह बदल जाता है कि कौन-सा फ़ैसला, यदि कोई हो, अब भी ज़रूरी लगता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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