संस्कृत
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखाः गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
adhaś cordhvaṃ prasṛtās tasya śākhāḥ guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ adhaś ca mūlāny anusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke
अनुवाद
उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, जो गुणों से पोषित होकर बढ़ती हैं और विषय ही जिनकी कोंपलें हैं। और नीचे मनुष्यलोक में उसकी जड़ें फैली हुई हैं, जो कर्म के बन्धन में बाँधती हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक वृक्ष को काटे जाने से पहले उसकी छवि को और घना करता है। इसकी शाखाएँ ऊपर और नीचे दोनों ओर फैलती हैं। उन्हें गुणों से पोषण मिलता है, यानी प्रकृति के उन तीन गुणों से जिनका वर्गीकरण अध्याय 14 में हुआ है। इन शाखाओं के सिरों पर इन्द्रियों के विषय नई कोंपलों के रूप में फूटते हैं। इसकी जड़ें नीचे मनुष्यों के लोक में “कर्मानुबन्धीनि” अर्थात् “कर्म से बँधी हुई” होकर फैलती हैं। इस श्लोक का असली सार यही समास है। यह जड़ों को स्वयं कर्म बताता है, यानी कर्म का वह संचित वेग जो पूरी संरचना को बार-बार फिर से उगाता रहता है। अध्याय 14 के ठीक बाद आने के कारण यह श्लोक एक समन्वय जैसा लगता है। गुण बताते हैं कि वृक्ष को पोषण किससे मिलता है और कर्म बताता है कि उसे स्थिर कौन रखता है। दोनों मिलकर समझाते हैं कि श्लोक 1 में “अव्ययम्” कहे जाने पर भी इस वृक्ष को केवल देखते रहना काफ़ी क्यों नहीं, बल्कि उसे काटना क्यों ज़रूरी है। यह वृक्ष गुणों से बढ़ता है। इन्द्रियों के विषय इसकी नई कोंपलें हैं, और यह “मनुष्यों के लोक” में नीचे की ओर सहायक जड़ें भेजता है। ये जड़ें बाँधने वाले कर्म हैं। संसार स्वयं अपना विस्तार करता है। विषयों में लगने से कर्म पैदा होता है, और वह कर्म मनुष्य की जड़ें और गहरी कर देता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- adhaś cordhvaṃ prasṛtās tasya śākhāḥअधश् चोर्ध्वं प्रसृतास् तस्य शाखाः
- उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं (adhaḥ + ca + ūrdhvam + prasṛtāḥ + tasya + śākhāḥ)
- guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥगुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः
- गुणों से पोषित, विषय जिनकी कोंपलें हैं (guṇa-pravṛddhāḥ + viṣaya-pravālāḥ)
- adhaś ca mūlāny anusantatāniअधश् च मूलान्य् अनुसन्ततानि
- और नीचे जड़ें फैली हुई हैं (adhaḥ + ca + mūlāni + anusantatāni)
- karmānubandhīni manuṣyalokeकर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके
- मनुष्यलोक में कर्म से बाँधने वाली (karma-anubandhīni + manuṣya-loke)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The verse assigns each part of the tree a distinct job: the gunas explain the growth spreading up and down, but karmānubandhīni names the roots specifically as accumulated action, not appetite or nature. That’s a precise diagnosis — the tree persists not primarily because it’s fed, but because it’s anchored, which means starving its inputs alone won’t fell it. Coming right after chapter 14’s guna taxonomy, this verse quietly redirects the reader’s attention from what feeds a pattern to what actually roots it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जो आदत बार-बार लौट आती है, वह आमतौर पर मुख्य रूप से उस क्षण के प्रलोभन से नहीं टिकी रहती जो उसे पोषण देता है — वह अतीत के चुनावों के उस संचित ढर्रे में जड़ जमाए रहती है जो आपको बार-बार वापस खींचता रहता है। उकसाने वाली स्थितियों (ट्रिगर) से दूरी बनाना मदद करता है, पर जिस जड़ से आपको निपटना है, वह स्वयं वह ढर्रा है।
व्यावसायिक
- कोई बार-बार होने वाली परिचालन समस्या अक्सर उस चीज़ से पैदा नहीं होती जो इस समय उसे भड़का रही है — उसकी जड़ किसी पुराने प्रक्रिया-निर्णय या मिसाल में होती है, जिस पर किसी ने दोबारा विचार नहीं किया। तात्कालिक कारण पर पैबंद लगाने से कुछ समय मिल जाता है; उस जड़ वाले निर्णय तक पहुँचकर उसे बदलना ही वास्तव में समस्या को गिराता है।
परिवार और समाज
- परिवार में बार-बार होने वाली बहस आमतौर पर वास्तव में आज के किसी विशेष कारण के बारे में नहीं होती — उसकी जड़ वर्षों में ऐसे ही क्षणों से बने एक संचित ढर्रे में होती है। हर बार उसके आज वाले रूप पर फिर से बहस करने के बजाय सीधे उस ढर्रे से निपटें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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