संस्कृत
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
tataḥ padaṃ tatparimārgitavyam yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ tam eva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī
अनुवाद
तब उस पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचकर लोग फिर लौटकर नहीं आते। और मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे पुरातन प्रवृत्ति प्रवाहित हुई है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
वृक्ष को काटने का काम यहाँ पूरा होता है: कटे हुए वृक्ष से परे “वह पद” है, जिसे वे पाते हैं जो लौटकर नहीं आते, और यह श्लोक उस लक्ष्य को सीधे उस आदि पुरुष (आद्यं पुरुषम्) के रूप में बताता है जिससे कर्म की पुरानी धारा मूल रूप से बही थी। इस अध्याय में पुरुष की भाषा का यह पहला प्रयोग है, और यह उस त्रिविध वर्गीकरण की पूर्व-झलक है — क्षर, अक्षर, और इन दोनों से परे पुरुषोत्तम — जिसे आगे श्लोक 16-18 औपचारिक रूप देंगे। “लौटकर नहीं आते” (न निवर्तन्ति) वही वाक्यांश है जो श्लोक 6 में कृष्ण के परम धाम के लिए आया है, और गीता में अन्यत्र भी (8.21, 8.26) यह फिर आता है, जहाँ यह स्वर्ग में अस्थायी निवास के विपरीत सच्ची मुक्ति का पारिभाषिक चिह्न है। श्लोक अचानक उत्तम पुरुष में आ जाता है — प्रपद्ये, “मैं शरण लेता हूँ” — कथन का यह एक दुर्लभ मोड़ है, जो वही प्रतिक्रिया करके दिखाता है जो यह उपदेश चाहता है। लक्ष्य आद्य पुरुष है, वह आदि पुरुष, जो उसी धारा का स्रोत है जिससे यह वृक्ष उगता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- tataḥ padaṃ tatparimārgitavyamततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
- तब उस पद को खोजना चाहिए (tataḥ + padam + tat-parimārgitavyam)
- yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥयस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः
- जहाँ पहुँचकर वे फिर नहीं लौटते (yasmin + gatāḥ + na + nivartanti + bhūyaḥ)
- tam eva cādyaṃ puruṣaṃ prapadyeतं एव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
- और उसी आदि पुरुष की मैं शरण लेता हूँ (tam + eva + ca + ādyam + puruṣam + prapadye)
- yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇīयतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी
- जिससे यह सनातन प्रवृत्ति फैली है (yataḥ + pravṛttiḥ + prasṛtā + purāṇī)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The syntax here mirrors the content: verse 3 leaves its sentence hanging mid-thought, and this verse only supplies the main clause after the cutting is done — the search for “that path” comes second, not first. Felling the tree isn’t the destination the chapter has been building toward; it’s the precondition that finally makes the search possible. It’s worth noticing this ordering, because it’s tempting to treat detachment itself as the finish line when the text clearly treats it as the entry point.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- किसी पुरानी आसक्ति या पहचान को छोड़ देने से काम पूरा नहीं हो जाता — इससे उस कठिन खोज का द्वार खुलता है कि आगे वास्तव में किस चीज़ के पीछे जाना सार्थक है। अनासक्ति से मिलने वाली राहत को मंज़िल पर पहुँच जाना न समझें; उसे द्वार मानें, गंतव्य नहीं।
व्यावसायिक
- किसी बिगड़ी हुई प्रक्रिया या पुरानी प्रणाली को हटा देना अपने आप में उपलब्धि नहीं है — वह बस असली काम को संभव बनाता है — और असली काम है उस बेहतर मॉडल को खोजना और बनाना जिसे उसकी जगह लेनी चाहिए। टीम को हटाने का उत्सव ऐसे न मनाने दें मानो वही परिणाम हो।
परिवार और समाज
- किसी व्यक्ति के साथ निर्भरता या किसी अस्वस्थ ढर्रे को समाप्त करना समाधान नहीं है — यह वह शुरुआत है जिससे आप सचमुच खोज पाते हैं कि उस संबंध का अधिक स्वस्थ रूप कैसा दिखता है। यह मानकर चलें कि असली काम इसके बाद शुरू होगा, इसी पर खत्म नहीं हो जाएगा।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।