संस्कृत
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ manaḥ ṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati
अनुवाद
इस जीवलोक में जीव बना हुआ सनातन अंश मेरा ही है; वह प्रकृति में स्थित इन्द्रियों को, जिनमें मन छठा है, अपनी ओर खींचता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ स्वर ब्रह्माण्डीय वृक्ष से हटकर व्यक्ति के मनोविज्ञान की ओर मुड़ता है: जीव, अर्थात् देहधारी आत्मा, को कृष्ण की अपनी आत्मा का एक सनातन “अंश” बताया गया है, जो फिर मन और पाँच इन्द्रियों को अपने चारों ओर वैसे ही खींच लेता है जैसे कोई स्वामी अपने औज़ार इकट्ठा करता है। “अंश” शब्द यहाँ वास्तविक तात्त्विक भूमिका निभाता है — यह श्लोक को व्यक्तिगत आत्मा और दिव्य आत्मा के बीच अंश और पूर्ण के संबंध से बाँधता है, न कि पूर्ण अभेद से या पूर्ण भेद से; यह वह स्थिति है जिसके इर्द-गिर्द बाद के टीकाकारों ने (विशेषकर रामानुज ने) व्याख्या के पूरे-पूरे सम्प्रदाय खड़े किए। यह वह श्लोक है जो सबसे सीधे उस आत्मा के विषय में है जैसा यह अध्याय उसे देखता है — अध्याय 2 का अमूर्त, अपरिवर्तनशील साक्षी-आत्मा नहीं, बल्कि वही आत्मा, जिसे उस रूप में समझा गया है जो वास्तव में एक देह से दूसरी देह में जाता है और पुनर्जन्म लेता है। ममैवांशो… जीवभूतः — “मेरा ही एक अंश, जो जीवात्मा बन गया है।” व्यक्तिगत आत्मा कृष्ण का अपना अंश है, और वह जिसे “अपनी ओर खींचता है”, वह है मन सहित पाँच इन्द्रियाँ — वह साधन-सामग्री जिसे वह एक देह से दूसरी देह तक धारण किए रहता है (गीता 15.8)।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mamaivāṃśo jīvalokeममैवांशो जीवलोके
- जीवलोक में मेरा ही अंश (mama + eva + aṃśaḥ + jīva-loke)
- jīvabhūtaḥ sanātanaḥजीवभूतः सनातनः
- सनातन जीव बनकर (jīva-bhūtaḥ + sanātanaḥ)
- manaḥ ṣaṣṭhānīndriyāṇiमनः षष्ठानीन्द्रियाणि
- मन जिनमें छठा है, उन इन्द्रियों को (manaḥ + ṣaṣṭhāni + indriyāṇi)
- prakṛtisthāni karṣatiप्रकृतिस्थानि कर्षति
- प्रकृति में स्थित, अपनी ओर खींचता है (prakṛti-sthāni + karṣati)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Portion” is a carefully chosen word: it commits the verse to neither strict identity between self and Self nor strict separation, but to a harder middle position that later schools would spend centuries arguing over. Easier language was available — the verse could have said the jiva “is” Krishna or is merely “apart from” him — and it chose neither. That refusal to collapse into the simpler option is itself the verse’s argument, not just its vocabulary.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- आपको इन दोनों में से किसी एक को चुनना ज़रूरी नहीं है कि या तो आप किसी बड़े उद्देश्य से पूरी तरह स्वतंत्र रहें या उसमें पूरी तरह विलीन हो जाएँ। आप वह कठिन बीच की स्थिति अपना सकते हैं, जिसमें आप किसी बड़ी चीज़ का सच्चा अंश होते हुए भी स्पष्ट रूप से स्वयं बने रहते हैं।
व्यावसायिक
- अपनी टीम में आप न तो पूरी तरह स्वायत्त होकर काम करने वाले व्यक्ति हैं और न ही कोई ऐसा पुर्ज़ा जिसे किसी से भी बदला जा सके। आप उसका सच्चा अंश हैं, जो अपने व्यक्तिगत विवेक को खोए बिना पूरे समूह की वास्तविक ज़िम्मेदारी उठाता है। न तो स्वतंत्रता की आसान कहानी में सिमटें और न ही अनुरूपता की आसान कहानी में।
परिवार और समाज
- आप अपने परिवार का एक अंश हैं, न उससे अभिन्न और न उससे अलग। आप वास्तव में किस तरह जुड़े हुए हैं, इसका ईमानदार वर्णन आमतौर पर यही कठिन बीच की स्थिति होती है, न कि पूरी तरह उलझ जाना या पूरी तरह दूर हो जाना।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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