संस्कृत
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
na rūpam asyeha tathopalabhyate nānto na cādir na ca saṃpratiṣṭhā aśvattham enaṃ suvirūḍhamūlam asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā
अनुवाद
यहाँ इसका रूप वैसा नहीं दिखाई देता, न इसका अन्त, न आदि और न ही इसका आधार। इस गहरी और दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ को अनासक्ति के दृढ़ शस्त्र से काटकर,
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
दो श्लोकों में वृक्ष का निर्माण करने के बाद, पाठ अब उसे गिराने की ओर मुड़ता है: कोई भी इस वृक्ष के रूप, आदि, अंत या आधार का पता नहीं लगा सकता, क्योंकि अनादि संसार के प्रतीक के रूप में यह ऐसी वस्तु नहीं है जिसे साधारण प्रत्यक्ष सीमा में बाँध सके। इसके लिए बताया गया साधन है असंग-शस्त्र, “अनासक्ति का शस्त्र” — न विश्लेषण, न कर्मकांड, बल्कि तलवार की तरह चलाई गई अनासक्ति। ध्यान दें कि वाक्य को यहाँ जान-बूझकर अधूरा छोड़ा गया है, जो श्लोक 4 के मुख्य उपवाक्य में जाकर पूरा होता है; वाक्य-रचना विषय-वस्तु को ही दर्शाती है, क्योंकि वृक्ष को काटना आगे की खोज की पूर्व-शर्त है, स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं। इस वृक्ष को पूरा देखा नहीं जा सकता — पकड़ने को कोई किनारा नहीं — फिर भी इसे काटा जा सकता है, एक ही साधन से: असंग-शस्त्र, अनासक्ति की कुल्हाड़ी। गीता 15.4 बताता है कि वृक्ष के गिर जाने के बाद क्या करना है: उस स्थान की खोज करें जहाँ से कोई लौटता नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- na rūpam asyeha tathopalabhyateन रूपं अस्येह तथोपलभ्यते
- यहाँ इसका रूप वैसा नहीं जाना जाता (na + rūpam + asya + iha + tathā + upalabhyate)
- nānto na cādir na ca saṃpratiṣṭhāनान्तो न चादिः न च संप्रतिष्ठा
- न इसका अंत, न आदि और न ही आधार (na + antaḥ + na + ca + ādiḥ + na + ca + saṃpratiṣṭhā)
- aśvattham enaṃ suvirūḍhamūlamअश्वत्थं एनं सुविरूढमूलं
- गहरी जड़ों वाले इस अश्वत्थ को (aśvattham + enam + su-virūḍha-mūlam)
- asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvāअसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा
- अनासक्ति के दृढ़ शस्त्र से काटकर (asaṅga-śastreṇa + dṛḍhena + chittvā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice what this verse refuses to give you: no shape, no beginning, no end, no foundation for the thing you’re meant to cut down. Most teachings would define the target before naming the tool; this one hands you the weapon — asaṅga-śastra, the blade of non-attachment — while admitting the target can’t be outlined. It’s a deliberate reversal of the usual order: you don’t need a complete diagnosis of samsara to act against it, only the willingness to wield detachment.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपने भीतर के किसी बिगड़े हुए ढर्रे के विरुद्ध कदम उठाने से पहले यह ज़रूरी नहीं कि आप उसे पूरी तरह समझ लें या समझा सकें। यदि आप उस साधन को पहचान सकते हैं — थोड़ा पीछे हटकर देखना, किसी परिणाम का मोह छोड़ देना — तो आप उसका उपयोग तब भी कर सकते हैं जब समस्या को ठीक-ठीक परिभाषित करना कठिन बना रहे।
व्यावसायिक
- किसी उलझे हुए पुराने सिस्टम के जो हिस्से आपको पीछे रोक रहे हैं, उनसे अलग होना शुरू करने से पहले उसका पूरा निदान ज़रूरी नहीं है। कोई ठोस तरीका पहचानिए — किसी हिस्से को चलन से बाहर करना, उसे अलग-थलग करना — और उसे लागू करना शुरू कीजिए, बजाय किसी ऐसे पूरे नक्शे की प्रतीक्षा करने के जो शायद कभी मिले ही नहीं।
परिवार और समाज
- किसी तनाव भरे रिश्ते में कुछ करने से पहले यह ज़रूरी नहीं कि आप पूरी तरह शब्दों में कह सकें कि गड़बड़ क्या है — कभी-कभी जिस अपेक्षा या भूमिका को आप पकड़े हुए हैं, उसे छोड़ देना ही वह कदम होता है जो उठाया जा सकता है, उससे पहले भी कि आप दोनों में से कोई समस्या का ठीक-ठीक वर्णन कर सके।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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