संस्कृत
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate
अनुवाद
परन्तु जो लोग अपने सभी कर्म मुझमें अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, अनन्य योग से ही मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ एक तीसरा अभ्यास सामने आता है: समस्त कर्मों को कृष्ण में त्याग देना (कर्म-संन्यास), जो अनन्य ध्यान (अनन्य योग) के साथ एक हो जाता है। यह कोई तीसरा प्रतिस्पर्धी मार्ग उतना नहीं है, जितना इस बात का वर्णन कि साकार रूप के प्रति भक्ति व्यवहार में वास्तव में किससे बनी होती है — श्लोक 2 के “मन को मुझमें लगाकर” के पीछे की ठोस विषयवस्तु। यह कोई तीसरा प्रतिस्पर्धी मार्ग नहीं है, बल्कि इस बात का वर्णन है कि साकार रूप के प्रति भक्ति वास्तव में किससे बनी होती है: कृष्ण को कर्म का समर्पण, जो अनन्य ध्यान के साथ एक हो जाता है — गीता 12.2 के “मन को मुझमें लगाकर” की ठोस विषयवस्तु।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- ye tu sarvāṇi karmāṇiये तु सर्वाणि कर्माणि
- परन्तु जो सभी कर्मों को (ye + tu + sarvāṇi + karmāṇi)
- mayi saṃnyasya matparāḥमयि संन्यस्य मत्पराः
- मुझमें अर्पित करके, मेरे परायण होकर (mayi + saṃnyasya + mat-parāḥ)
- ananyenaiva yogena māṃअनन्येनैव योगेन मां
- अनन्य योग से ही मुझे (ananyena + eva + yogena + mām)
- dhyāyanta upāsateध्यायन्त उपासते
- ध्यान करते हुए उपासना करते हैं (dhyāyantaḥ + upāsate)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“Fix your mind on Me” from verse 2 was an instruction with no handle on it — this verse hands you one: renounce actions into Krishna, meditate without division. An instruction that stays abstract can be agreed with and still never practiced; this verse’s whole function is to convert agreement into something a person can actually do on a given day.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप अपने लिए कोई अमूर्त संकल्प तय करें — "अधिक सजग रहूँगा", "अधिक परवाह करूँगा" — तो उसे तुरंत किसी एक ठोस, बार-बार दोहराए जा सकने वाले काम में बदल दें, ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक "मुझमें मन लगाओ" को एक वास्तविक अभ्यास में बदल देता है। अस्पष्ट संकल्प किसी साधारण दिन की भागदौड़ में शायद ही टिक पाते हैं।
व्यावसायिक
- जब नेतृत्व ऊपर से कोई अमूर्त मूल्य थमा दे, जैसे "ग्राहक को सर्वोपरि रखो", तो आपका असली काम यह तय करना है कि आपकी टीम के लिए कौन-सा ठोस अभ्यास उस मूल्य को साकार करेगा — जब तक वह मूल्य किसी कार्य-प्रक्रिया में नहीं बदलता, तब तक अकेले वह रोज़मर्रा के काम में कुछ नहीं बदलता।
परिवार और समाज
- यदि आप अपने किसी करीबी से कहें, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा", तो तुरंत यह भी बताएँ कि वह साथ किस ठोस रूप में होगा — हर हफ़्ते एक फ़ोन कॉल, या कोई नियमित ज़िम्मेदारी। जब तक वह वादा किसी वास्तविक अभ्यास में नहीं बदलता, तब तक उसका कोई ख़ास अर्थ नहीं होता।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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