12.5

संस्कृत

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥

kleśo 'dhikataras teṣām avyaktāsaktacetasām avyaktā hi gatir duḥkhaṃ dehavadbhir avāpyate

अनुवाद

जिनका चित्त अव्यक्त में आसक्त है, उनके लिए क्लेश अधिक है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त गति को पाना कठिन है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यही वह वास्तविक तर्क है जो श्लोक 2 में किए गए क्रम-निर्धारण के पीछे था, और जिसे अब तक टाला गया था: अव्यक्त का मार्ग गंतव्य में कमतर नहीं है, केवल व्यवहार में कठिन है, क्योंकि यह मार्ग देहधारी मन से उसे ग्रहण करने को कहता है जिसमें थामने के लिए कोई रूप ही नहीं है। यही व्यावहारिक दृष्टि — पद्धति की कठिनाई, लक्ष्य की वैधता नहीं — उन क्रमिक, सरल विकल्पों का आधार बनती है जिन्हें कृष्ण श्लोक 6 से आगे रखते हैं। गीता 12.2 के क्रम-निर्धारण के पीछे का तर्क, जो यहाँ तक टाला गया: अव्यक्त मार्ग गंतव्य में कमतर नहीं है, केवल व्यवहार में कठिन है — वह देहधारी मन से उसे थामने को कहता है जिसमें थामने योग्य कोई रूप नहीं है। “पद्धति की कठिनाई, लक्ष्य की वैधता नहीं” वाली यही दृष्टि गीता 12.6 से आगे के सरल विकल्पों का आधार बनती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kleśo 'dhikataras teṣāmक्लेशो ऽधिकतरस् तेषां
उनका क्लेश अधिक होता है (kleśaḥ + adhikataraḥ + teṣām)
avyaktāsaktacetasāmअव्यक्तासक्तचेतसां
जिनका चित्त अव्यक्त में आसक्त है (avyakta-āsakta-cetasām)
avyaktā hi gatir duḥkhaṃअव्यक्ता हि गतिः दुःखं
क्योंकि अव्यक्त गति कठिनाई से (avyaktā + hi + gatiḥ + duḥkham)
dehavadbhir avāpyateदेहवद्भिः अवाप्यते
देहधारियों द्वारा प्राप्त की जाती है (deha-vadbhiḥ + avāpyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This is where Krishna finally shows his work: the unmanifest path isn’t ranked second because it disagrees with anything, only because an embodied mind has nothing to hold onto in it. Stating the actual reason for a preference, rather than letting the ranking alone imply one, is what makes verse 2’s verdict something other than an unexplained authority claim.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी आदत का ज़्यादा ठोस रूप चुनते हैं — "बस याद रखने" के बजाय लिखी हुई जाँच-सूची, "जब भी समय मिले" के बजाय एक तय समय — तो आप अनुशासन में असफल नहीं हो रहे हैं। आप ठीक वही पहचान रहे हैं जो यह श्लोक पहचानता है: आपके मन को थामने के लिए किसी चीज़ की ज़रूरत होती है।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी सहकर्मी के पसंदीदा, अधिक अमूर्त तरीके के बजाय एक ठोस प्रक्रिया चुनते हैं, तो आप साफ़-साफ़ कह सकते हैं कि बात इसकी है कि टीम के लिए वास्तव में क्या लंबे समय तक निभ सकता है — यह श्लोक भी अपना तर्क खुलकर कहता है, पसंद को ज़रूरत का जामा नहीं पहनाता।

परिवार और समाज

  • जब आप अपने साथी से "बस मेरा थोड़ा और ध्यान रखो" कहने के बजाय कुछ ठोस और स्पष्ट माँगते हैं, तो यह ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता नहीं है — यह ईमानदारी से, जैसे यह श्लोक करता है, उस चीज़ का नाम लेना है जिसकी आपके मन को टिके रहने के लिए वास्तव में ज़रूरत है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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