किसी बात को छोड़ न पाना

उसे बार-बार मन में दोहराना, उस हद से आगे भी पकड़े रहना जहाँ तक वह मदद करती है।

  1. 1 · अध्याय 2 · श्लोक 62

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

    विषयों का चिन्तन करते रहने वाले मनुष्य की उनमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है; आसक्ति से काम जन्म लेता है और काम से क्रोध उत्पन्न होता है।

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  2. 2 · अध्याय 2 · श्लोक 22

    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

    जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण कर लेता है, वैसे ही देही पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।

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  3. 3 · अध्याय 16 · श्लोक 21

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

    काम, क्रोध और लोभ — ये नरक के तीन प्रकार के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए मनुष्य को इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।

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  4. 4 · अध्याय 2 · श्लोक 56

    दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

    दुःखों में जिसका मन विचलित नहीं होता, सुखों में जिसकी कोई लालसा नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त हो गया है, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।

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  5. 5 · अध्याय 6 · श्लोक 26

    यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

    यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटककर निकल जाए, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर आत्मा के ही वश में लाना चाहिए।

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