जीवन का उद्देश्य खो गया है

बस यंत्रवत सब करते जा रहे हैं, पता नहीं क्यों।

  1. 1 · अध्याय 3 · श्लोक 8

    नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

    तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है; और कर्म न करने से तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

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  2. 2 · अध्याय 18 · श्लोक 9

    कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

    हे अर्जुन, जो नियत कर्म "यह करना ही चाहिए" ऐसा मानकर, आसक्ति और फल दोनों को त्यागकर किया जाता है, वह त्याग सात्त्विक माना गया है।

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  3. 3 · अध्याय 2 · श्लोक 47

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

    तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो, और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

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  4. 4 · अध्याय 3 · श्लोक 19

    तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

    इसलिए आसक्ति से रहित होकर तुम सदा करने योग्य कर्म को भली-भाँति करते रहो, क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त होता है।

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  5. 5 · अध्याय 4 · श्लोक 38

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

    इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही और कुछ नहीं है। योग में पूर्णतः सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर उसे स्वयं ही अपने भीतर, आत्मा में पा लेता है।

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