अभ्यास
5 दिन — परिणाम को छोड़ना
नतीजा कैसा निकलता है, इस पर अपनी पकड़ ढीली करना।
दिन 1 — कर्म करें, फिर छोड़ दें
कर्म करें; परिणाम आपका नहीं है।
गीता 2.47 — तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो, और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो। पढ़ें →
अभ्यास
आज कोई एक काम चुनें और उसे अच्छी तरह करें, बिना यह देखे कि उसका क्या असर हुआ।
दिन 2 — समता
स्थिरता ही अभ्यास है।
गीता 2.48 — हे धनञ्जय, योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर और सफलता तथा असफलता में सम होकर कर्म करो; यही समत्व योग कहलाता है। पढ़ें →
अभ्यास
आज जब कुछ गड़बड़ हो जाए, तो प्रतिक्रिया देने से पहले एक साँस भर रुकें।
दिन 3 — किसी सहारे पर न टिकें
स्थिर महसूस करने के लिए किसी भी सहारे पर निर्भर न रहें।
गीता 4.20 — जो कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर सदा तृप्त रहता है और किसी पर आश्रित नहीं होता, वह कर्म में भली-भाँति लगा हुआ होने पर भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता। पढ़ें →
अभ्यास
उस एक परिणाम या स्वीकृति का नाम लें जिस पर आप टिके हैं, और ऐसे कर्म करें मानो वह पहले ही जा चुकी हो।
दिन 4 — कोई हिसाब नहीं
लाभ और हानि को एक समान तौलें।
गीता 2.38 — सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा। पढ़ें →
अभ्यास
आज एक निर्णय ऐसा लें जिसमें पहले यह हिसाब न लगाएँ कि उससे आपको क्या मिलेगा या क्या खोना पड़ेगा।
दिन 5 — बस लौट आएँ
लौट आना ही अभ्यास है।
गीता 6.26 — यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटककर निकल जाए, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर आत्मा के ही वश में लाना चाहिए। पढ़ें →
अभ्यास
आज जब भी आपका ध्यान टूटे, उस रुकावट को आँके बिना वापस लौट आएँ।