दूसरों से अपनी तुलना करना

किसी और का मार्ग आपके मार्ग से बेहतर दिखता है।

  1. 1 · अध्याय 3 · श्लोक 35

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

    भली-भाँति आचरण किए गए पराए धर्म से अपना धर्म, गुणरहित होने पर भी, श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है; पराया धर्म भय देने वाला है।

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  2. 2 · अध्याय 18 · श्लोक 48

    सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

    हे कौन्तेय, स्वभाव से उत्पन्न कर्म को, दोषयुक्त होने पर भी, नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि जैसे धुएँ से अग्नि ढकी रहती है, वैसे ही सभी आरम्भ किसी न किसी दोष से ढके रहते हैं।

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  3. 3 · अध्याय 2 · श्लोक 47

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

    तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो, और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

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  4. 4 · अध्याय 6 · श्लोक 6

    बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

    जिसने आत्मा के द्वारा अपनी आत्मा को जीत लिया है, उसकी आत्मा ही उसका बन्धु है; किन्तु जिसने अपनी आत्मा को नहीं जीता, उसकी आत्मा ही शत्रु की भाँति शत्रुता में बरतती है।

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  5. 5 · अध्याय 13 · श्लोक 8

    अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

    मान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।

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