दिव्य महिमा
अध्याय 10 में कृष्ण की उन अभिव्यक्तियों की सूची से, जो अपनी-अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ हैं, अध्याय 11 में विश्वरूप के प्रत्यक्ष और अभिभूत कर देने वाले दर्शन तक, जिसकी ओर वह सूची हमेशा केवल संकेत ही कर रही थी।
गीता 10.21
आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ। मरुतों में मैं मरीचि हूँ और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।
गीता 10.41
जो-जो भी सत्ता विभूतियुक्त, शोभायुक्त अथवा बलशाली है, उस-उस को तुम मेरे तेज के एक अंश से ही उत्पन्न हुआ जानो।
गीता 10.42
अथवा हे अर्जुन, इस बहुत-से विस्तार को जानने से तुम्हें क्या प्रयोजन? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।
गीता 11.32
मैं लोकों का विनाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ और यहाँ लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे बिना भी विरोधी सेनाओं में खड़े ये सब योद्धा जीवित नहीं बचेंगे।
गीता 11.54
परन्तु हे अर्जुन, अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे इस प्रकार तत्त्व से जाना, देखा और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है, हे परन्तप।